रात Poetry (page 65)

इश्क़ का परचा

दिलावर फ़िगार

हुस्न पर ए'तिबार हद कर दी

दिलावर फ़िगार

मख़्फ़ी हैं अभी दिरहम-ओ-दीनार हमारे

दिलावर अली आज़र

लम्हा लम्हा वुसअत-ए-कौन-ओ-मकाँ की सैर की

दिलावर अली आज़र

शबाब ढलते ही आई पीरी मआ'ल पर अब नज़र हुई है

दिल शाहजहाँपुरी

रह गया ख़्वाब-ए-दिल-आराम अधूरा किस का

दिल अय्यूबी

देखते देखते ही साल गुज़र जाता है

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़

उम्मीद

दाऊद ग़ाज़ी

सौग़ात

दाऊद ग़ाज़ी

रूह-ए-आवारा

दाऊद ग़ाज़ी

हुस्न इस शम्अ-रू का है गुल-रंग

दाऊद औरंगाबादी

क़िस्मत बुरे किसी के न इस तरह लाए दिन

दत्तात्रिया कैफ़ी

राज़-ए-निहाँ थी ज़िंदगी राज़-ए-निहाँ है आज भी

दर्शन सिंह

हँसी गुलों में सितारों में रौशनी न मिली

दर्शन सिंह

हश्र इक गुज़रा है वीराने पे घर होने तक

दानिश फ़राही

रूदाद-ए-शब-ए-ग़म यूँ डरता हूँ सुनाने से

दानिश अलीगढ़ी

वाइज़ तू अगर उन के कूचे से गुज़र जाए

दानिश अलीगढ़ी

शिरकत-ए-ग़म भी नहीं चाहती ग़ैरत मेरी

दाग़ देहलवी

मुअज़्ज़िन ने शब-ए-वस्ल अज़ाँ पिछले पहर

दाग़ देहलवी

क्यूँ वस्ल की शब हाथ लगाने नहीं देते

दाग़ देहलवी

दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात

दाग़ देहलवी

चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक़

दाग़ देहलवी

तेरी सूरत को देखता हूँ मैं

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल ज़िद में बसर हो गई

दाग़ देहलवी

क़रीने से अजब आरास्ता क़ातिल की महफ़िल है

दाग़ देहलवी

पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह

दाग़ देहलवी

फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्यूँकर

दाग़ देहलवी

निगाह-ए-शोख़ जब उस से लड़ी है

दाग़ देहलवी

मोहब्बत में आराम सब चाहते हैं

दाग़ देहलवी

खुलता नहीं है राज़ हमारे बयान से

दाग़ देहलवी

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