रात Poetry (page 67)

कितना अजीब शब का ये मंज़र लगा मुझे

बिस्मिल आग़ाई

कब एक रंग में दुनिया का हाल ठहरा है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

हमारी जागती आँखों में ख़्वाब सा क्या था

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

दीवार-ओ-दर में सिमटा इक लम्स काँपता है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

अपनी तो कोई बात बनाए नहीं बनी

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

उलझ रहा था अभी ख़्वाब की फ़सील से मैं

बिलाल अहमद

अजल की फूँक मिरे कान में सुनाई दी

बिलाल अहमद

रुख़-ए-रौशन पे उस की गेसू-ए-शब-गूँ लटकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ख़याल-ए-नावक-ए-मिज़्गाँ में बस हम सर पटकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

मुस्तक़िल रोने से दिल की बे-कली बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त

मिरी ही बात सुनती है मुझी से बात करती है

भारत भूषण पन्त

कभी सुकूँ कभी सब्र-ओ-क़रार टूटेगा

भारत भूषण पन्त

बात करने की शब-ए-वस्ल इजाज़त दे दो

बेख़ुद देहलवी

हर एक बात तिरी बे-सबात कितनी है

बेख़ुद देहलवी

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर

बेख़ुद देहलवी

बात करने की शब-ए-वस्ल इजाज़त दे दो

बेख़ुद देहलवी

अब इस से क्या तुम्हें था या उमीद-वार न था

बेख़ुद देहलवी

आशिक़ समझ रहे हैं मुझे दिल लगी से आप

बेख़ुद देहलवी

आशिक़ हैं मगर इश्क़ नुमायाँ नहीं रखते

बेख़ुद देहलवी

मुझ को शिकस्तगी का क़लक़ देर तक रहा

बेकल उत्साही

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है

बहज़ाद लखनवी

कुछ बे-अदबी और शब-ए-वस्ल नहीं की

बेगम लखनवी

बरसों ग़म-ए-गेसू में गिरफ़्तार तो रक्खा

बेगम लखनवी

बड़े अरमान से निकला था शॉपिंग के लिए घर से

बेदिल जौनपूरी

बहुत ज़ोरों पे वी-सी-आर था कल शब जहाँ मैं था

बेदिल जौनपूरी

दरिया ने कल जो चुप का लिबादा पहन लिया

बेदिल हैदरी

तुम ख़फ़ा हो तो अच्छा ख़फ़ा हो

बेदम शाह वारसी

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