रात Poetry (page 68)

पास-ए-अदब मुझे उन्हें शर्म-ओ-हया न हो

बेदम शाह वारसी

पर्दे उठे हुए भी हैं उन की इधर नज़र भी है

बेदम शाह वारसी

पहले शर्मा के मार डाला

बेदम शाह वारसी

बरहमन मुझ को बनाना न मुसलमाँ करना

बेदम शाह वारसी

रौनक़ फ़रोग़-ए-दर्द से कुछ अंजुमन में है

बेबाक भोजपुरी

बड़ी दिल-शिकन है रह-ए-सफ़र कोई हम-सफ़र है न यार है

बेबाक भोजपुरी

ये मैं कहूँगा फ़लक पे जा कर ज़मीं से आया हूँ तंग आ कर

बयान मेरठी

मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल

बयान मेरठी

ऐ जुनूँ हाथ के चलते ही मचल जाऊँगा

बयान मेरठी

आएँगे गर उन्हें ग़ैरत होगी

बयान मेरठी

कोई मेयार-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द

बासित भोपाली

ज़ोर से साँस जो लेता हूँ तो अक्सर शब-ए-ग़म

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

कौन कहता है नसीम-ए-सहरी आती है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी

बशीर ज़ैदी असीर

तख़लीक़-ए-काएनात दिगर कर सके तो कर

बशीर फ़ारूक़

मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ

बशीर बद्र

लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख जाए

बशीर बद्र

वो सूरत गर्द-ए-ग़म में छुप गई हो

बशीर बद्र

सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में

बशीर बद्र

नज़र से गुफ़्तुगू ख़ामोश लब तुम्हारी तरह

बशीर बद्र

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

जब सहर चुप हो हँसा लो हम को

बशीर बद्र

जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है

बशीर बद्र

अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ

बशीर बद्र

हुई मुद्दतें ऐ दिल-ए-हज़ीं न पयाम है न सलाम है

बशीरुद्दीन राज़

दम-ब-ख़ुद है चाँदनी चुप-चाप हैं अश्जार भी

बशीर मुंज़िर

क़र्या क़र्या ख़ाक उड़ाई कूचा-गर्द फ़क़ीर हुए

बशीर अहमद बशीर

कैसी कैसी थीं उन्ही गलियों में ज़ेबा सूरतें

बशीर अहमद बशीर

दूर तक चारों तरफ़ मेरे सिवा कोई न था

बशीर अहमद बशीर

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