रात Poetry (page 90)

हमेशा ज़ुल्म के मंज़र हमें दिखाए गए

अहमद नदीम क़ासमी

दावा तो किया हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ का सब ने

अहमद नदीम क़ासमी

बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था

अहमद नदीम क़ासमी

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले

अहमद मुश्ताक़

उदास कर के दरीचे नए मकानों के

अहमद मुश्ताक़

था मुझ से हम-कलाम मगर देखने में था

अहमद मुश्ताक़

रुख़्सत-ए-शब का समाँ पहले कभी देखा न था

अहमद मुश्ताक़

लुभाता है अगरचे हुस्न-ए-दरिया डर रहा हूँ मैं

अहमद मुश्ताक़

खड़े हैं दिल में जो बर्ग-ओ-समर लगाए हुए

अहमद मुश्ताक़

हर लम्हा ज़ुल्मतों की ख़ुदाई का वक़्त है

अहमद मुश्ताक़

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी

अहमद मुश्ताक़

धड़कती रहती है दिल में तलब कोई न कोई

अहमद मुश्ताक़

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले

अहमद मुश्ताक़

भूले-बिसरे मौसमों के दरमियाँ रहता हूँ मैं

अहमद मुश्ताक़

अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा

अहमद मुश्ताक़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

उन आँखों में रंग-ए-मय नहीं है

अहमद महफ़ूज़

किसी का अक्स-ए-बदन था न वो शरारा था

अहमद महफ़ूज़

छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ

अहमद महफ़ूज़

दाना-ए-गंदुम-ए-बेदार उठाने लगा हूँ

अहमद कामरान

तुलू-ए-साअत-ए-शब-ख़ूँ है और मेरा दिल

अहमद जावेद

किसी का ध्यान मह-ए-नीम-माह में आया

अहमद जावेद

दिल-ए-बेताब के हमराह सफ़र में रहना

अहमद जावेद

आँसू की तरह दीदा-ए-पुर-आब में रहना

अहमद जावेद

फ़ीरोज़ी तस्बीह का घेरा हाथ में जल्वा-अफ़्गन था

अहमद जहाँगीर

शब-ए-माह में जो पलंग पर मिरे साथ सोए तो क्या हुए

अहमद हुसैन माइल

समझ के हूर बड़े नाज़ से लगाई चोट

अहमद हुसैन माइल

खड़े हैं मूसा उठाओ पर्दा दिखाओ तुम आब-ओ-ताब-ए-आरिज़

अहमद हुसैन माइल

हो गए मुज़्तर देखते ही वो हिलती ज़ुल्फ़ें फिरती नज़र हम

अहमद हुसैन माइल

आफ़्ताब आए चमक कर जो सर-ए-जाम-ए-शराब

अहमद हुसैन माइल

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