शमा Poetry (page 10)

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

बा'द-ए-मजनूँ क्यूँ न हूँ मैं कार-फ़रमा-ए-जुनूँ

शाह नसीर

है अयाँ रू-ए-यार आँखों में

शाह आसिम

बे-ख़ुदी में अजब मज़ा देखा

शाह आसिम

थी लगन सुनते तिरी शोख़ी-ए-पा की आहट

शाग़िल क़ादरी

क़फ़स में रह के गुल-ओ-नस्तरन की बात करो

शाग़िल क़ादरी

मौसम-ए-गुल आ गया फिर दश्त-पैमाई रहे

शाग़िल क़ादरी

बला जाने किसी की हिज्र में इस दिल पे क्या गुज़री

शाग़िल क़ादरी

हम ने तो यही मा'रका मारा है सफ़र में

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

दोस्त या दुश्मन-ए-जाँ कुछ भी तुम अब बन जाओ

शफ़ीक़ ख़लिश

जला वो शम्अ कि आँधी जिसे बुझा न सके

शफ़ीक़ जौनपुरी

कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है

शफ़ीक़ जौनपुरी

ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-बदन शाम-ए-क़ज़ा से रौशन

शफ़क़ सुपुरी

ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-बदन शाम-ए-क़ज़ा से रौशन

शफ़क़ सुपुरी

ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं

शाद लखनवी

ख़त देखिए दीदार की सूझी ये नई है

शाद लखनवी

इश्क़-ए-रुख़-ओ-ज़ुल्फ़ में किया कूच

शाद लखनवी

गोश कर फ़रियाद-ए-आशिक़ जान कर

शाद लखनवी

दिल की कहूँ या कहूँ जिगर की

शाद लखनवी

दम-ए-आख़िर ये शिकवा क्या न करता

शाद लखनवी

बद-गुमानी जो हुई शम्अ' से परवाने को

शाद लखनवी

परवानों का तो हश्र जो होना था हो चुका

शाद अज़ीमाबादी

क्यूँ हो बहाना-जू न क़ज़ा सर से पाँव तक

शाद अज़ीमाबादी

कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था

शाद अज़ीमाबादी

किस पे क़ाबू जो तुझी पे नहीं क़ाबू अपना

शाद अज़ीमाबादी

अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया

शाद अज़ीमाबादी

दोस्ती का सितारा

शब्बीर शाहिद

अपनी तलब का नाम डुबोने क्यूँ जाएँ मय-ख़ाने तक

शायर लखनवी

इंतिज़ार था हम को ख़ुशनुमा बहारों का

शाद आरफ़ी

चमन को आग लगाने की बात करता हूँ

शाद आरफ़ी

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