शमा Poetry (page 9)
अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है
शहज़ाद अहमद
ज़मीं से ता-ब-फ़लक धुँद की ख़ुदाई है
शहरयार
शम-ए-दिल शम-ए-तमन्ना न जला मान भी जा
शहरयार
इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं
शहरयार
बुनियाद-ए-जहाँ में कजी क्यूँ है
शहरयार
आँधी की ज़द में शम-ए-तमन्ना जलाई जाए
शहरयार
मैं ज़हर रही हर शाम रही
शाहिदा तबस्सुम
जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है
शाहिद ज़की
रात भी बाक़ी है सहबा भी शीशा भी पैमाना भी
शाहिद इश्क़ी
न ख़ुदा है न नाख़ुदा है कोई
शाहिद इश्क़ी
मुब्तला रूह के अज़ाब में हूँ
शाहिद इश्क़ी
जाने क्या वज्ह-ए-बेगानगी है
शाहिद इश्क़ी
हर मर्ग-ए-आरज़ू का निशाँ देर तक रहा
शाहिद इश्क़ी
इक न आने वाले का इंतिज़ार करते हैं
शाहिद इश्क़ी
सुना है तेरी ज़माने पे हुक्मरानी है
शाहिद ग़ाज़ी
महका है गुल-ए-ख़ून-ए-वफ़ा जानिए क्या हो
शाहिद अख़्तर
ये भी शायद तिरा ए'जाज़-ए-नज़र है ऐ दोस्त
शाहीन ग़ाज़ीपुरी
दयार-ए-शाम न बुर्ज-ए-सहर में रौशन हूँ
शहबाज़ नदीम ज़ियाई
शाम रखती है बहुत दर्द से बेताब मुझे
शहाब जाफ़री
सब पे रौशन है कि राह-ए-इश्क़ में मानिंद-ए-शम्अ
शाह नसीर
उस काकुल-ए-पुर-ख़म का ख़लल जाए तो अच्छा
शाह नसीर
सदा है इस आह-ओ-चश्म-ए-तर से फ़लक पे बिजली ज़मीं पे बाराँ
शाह नसीर
न ज़िक्र-ए-आश्ना ने क़िस्सा-ए-बेगाना रखते हैं
शाह नसीर
मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता
शाह नसीर
जुदा नहीं है हर इक मौज देख आब के बीच
शाह नसीर
जिगर का जूँ शम्अ काश या-रब हो दाग़ रौशन मुराद हासिल
शाह नसीर
जब तलक चर्ब न जूँ शम्-ए-ज़बाँ कीजिएगा
शाह नसीर
हो चुकी बाग़ में बहार अफ़सोस
शाह नसीर
दिल जल्वा-गाह-ए-सूरत-ए-जानाना हो गया
शाह नसीर
दिखा दो गर माँग अपनी शब को तो हश्र बरपा हो कहकशाँ पर
शाह नसीर
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