शमा Poetry (page 7)
यूसुफ़ ही ज़र-ख़रीदों में फ़िरोज़-बख़्त था
शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान
ऐ शम्अ तेरी उम्र-ए-तबीई है एक रात
ज़ौक़
न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुआँ होता
ज़ौक़
क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले
ज़ौक़
क्या आए तुम जो आए घड़ी दो घड़ी के बाद
ज़ौक़
कोई कमर को तिरी कुछ जो हो कमर तो कहे
ज़ौक़
कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करे
ज़ौक़
हाथ सीने पे मिरे रख के किधर देखते हो
ज़ौक़
इक सदमा दर्द-ए-दिल से मिरी जान पर तो है
ज़ौक़
दूद-ए-दिल से है ये तारीकी मिरे ग़म-ख़ाना में
ज़ौक़
दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे
ज़ौक़
चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए
ज़ौक़
ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ
ज़ौक़
आँखें मिरी तलवों से वो मिल जाए तो अच्छा
ज़ौक़
रतजगा
शाज़ तमकनत
तिरी नज़र सबब-ए-तिश्नगी न बन जाए
शाज़ तमकनत
छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी
शाज़ तमकनत
बना हुस्न-ए-तकल्लुम हुस्न-ए-ज़न आहिस्ता आहिस्ता
शाज़ तमकनत
बाक़ी न रहे होश जुनूँ ऐसा हुआ तेज़
शौक़ माहरी
रो रही है जिस तरह ये शम्अ परवाने के बाद
शौक़ देहलवी मक्की
मिले हैं दर्द ही मुझ को मोहब्बतों के एवज़
शारिब मौरान्वी
पत्थर की भूरी ओट में लाला खिला था कल
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
देखिए बे-बदनी कौन कहेगा क़ातिल है
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ख़लिश हो जिस में वो अरमाँ तलाश करता हूँ
शम्स इटावी
न कोई अपना ग़म है और न अब कोई ख़ुशी अपनी
शम्स फ़र्रुख़ाबादी
शराब ओ शेर के साँचे में ढल के आई है
शमीम करहानी
शम्अ' पर शम्अ' जलाती हुई साथ आती है
शमीम करहानी
चमन लहक के रह गया घटा मचल के रह गई
शमीम करहानी
जाते कहाँ जुनून के तूफ़ाँ में आ गए
शाकिर इनायती
फूल से लोगों को मिट्टी में मिला कर आएगी
शकील सरोश
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