सोच Poetry (page 12)

जूही का पौदा

राही मासूम रज़ा

एक इक लम्हा कि एक एक सदी हो जैसे

इक़बाल उमर

छतों पे आग रही बाम-ओ-दर पे धूप रही

इक़बाल उमर

कल शब दिल-ए-आवारा को सीने से निकाला

इक़बाल साजिद

नगर में रहते थे लेकिन घरों से दूर रहे

इक़बाल मिनहास

सुपुर्द-ए-ग़म-ज़दगान-ए-सफ़-ए-वफ़ा हुआ मैं

इक़बाल कौसर

कुछ ऐसे ज़ख़्म भी दर-पर्दा हम ने खाए हैं

इक़बाल अज़ीम

ऐ अहल-ए-वफ़ा दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते

इक़बाल अज़ीम

अब इसे क्या करे कोई आँखों में रौशनी नहीं

इक़बाल अज़ीम

ख़िज़ाँ का क़र्ज़ तो इक इक दरख़्त पर है यहाँ

इक़बाल अशहर कुरेशी

अपने बदन को छोड़ के पछताओगे मियाँ

इंतिख़ाब सय्यद

समझने वाला मिरा मर्तबा समझता है

इनआम आज़मी

ये क़िस्सा-ए-मुख़्तसर नहीं है

इम्तियाज़-उल-हक़ इम्तियाज़

कोई तो है जो आहों में असर आने नहीं देता

इमरान-उल-हक़ चौहान

काला

इमरान शमशाद

मुद्दत से आदमी का यही मसअला रहा

इमरान शमशाद

हमारी मोहब्बत नुमू से निकल कर कली बन गई थी मगर थी नुमू में

इमरान शमशाद

परिंदा आइने से क्या लड़ेगा

इमरान आमी

जितने पानी में कोई डूब के मर सकता है

इमरान आमी

मेरे सर में जो रात चक्कर था

इम्दाद इमाम असर

दाग़ बैआ'ना हुस्न का न हुआ

इमदाद अली बहर

न-जाने कौन तिरे काख़-ओ-कू में आएगा

इलियास बाबर आवान

सब तरह के हालात को इम्कान में रक्खा

इफ्तिखार शफ़ी

छोड़ा न मुझे दिल ने मिरी जान कहीं का

इफ़्तिख़ार राग़िब

बन गया है जिस्म गुज़रे क़ाफ़िलों की गर्द सा

इफ़्तिख़ार नसीम

अपना सारा बोझ ज़मीं पर फेंक दिया

इफ़्तिख़ार नसीम

बे-ख़बर मुझ से मिरे दिल में हमेशा हँसता

इफ़्तिख़ार बुख़ारी

घबरा गए हैं वक़्त की तन्हाइयों से हम

इफ़्फ़त ज़र्रीं

करें सलाम उसे तो कोई जवाब न दे

इब्राहीम अश्क

मकड़ी

इब्न-ए-मुफ़्ती

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