सूरज Poetry (page 10)

गर्म-जोशी के नगर में सर्द-तन्हाई मिली

शाहीन बद्र

यादों की दीवार गिराता रहता हूँ

शाहबाज़ रिज़्वी

सो गया ओढ़ के फिर शब की क़बाएँ सूरज

शहबाज़ ख़्वाजा

कब गवारा है मुझे और कहीं पर चमके

शहबाज़ ख़्वाजा

इक ऐसा वक़्त भी सहरा में आने वाला है

शहबाज़ ख़्वाजा

सूरज का शहर

शहाब जाफ़री

शहर-ए-अना में

शहाब जाफ़री

मैं

शहाब जाफ़री

हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का मौसम निकल गया

शहाब जाफ़री

दश्त-ए-ग़ुर्बत है तो वो क्यूँ हैं ख़फ़ा हम से बहुत

शहाब जाफ़री

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

अब कहाँ ले के छुपें उर्यां बदन और तन जला

शहाब जाफ़री

एक सूरज को सुरख़-रू कर के

सगुफ़ता यासमीन

शक़ आफ़ियत-कनार किनारे को कर गई

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है

शफ़ीक़ जौनपुरी

ज़िंदगी तुझ से हमें अब कोई शिकवा ही नहीं

शफ़ीक़ देहलवी

जैसे सुब्ह को सूरज निकले शाम ढले छुप जाए है

शफ़ीक़ देहलवी

मोहब्बत की करिश्मा-साज़ियाँ आवाज़ देती हैं

शफ़ीक़ आसिफ़

ख़ुशबुओं से मिरी हर साँस को भर देता है

शबनम वहीद

हम-नशीनो कुछ नहीं रक्खा यहाँ पर कुछ नहीं

शबनम शकील

ढलता सूरज आँख का रेज़ा हो जाता है

शबनम रूमानी

दोस्ती का सितारा

शब्बीर शाहिद

मिरे हक़ में कोई ऐसी दुआ कर

सीमान नवेद

खोट की माला झूट जटाएँ अपने अपने ध्यान

सीमाब ज़फ़र

ज़र्रे ज़र्रे हैं अक्स के हर-सू

सीमा शर्मा मेरठी

रात दिन आग में पला सूरज

सीमा शर्मा मेरठी

पूछ मत कल आइने में क्या हुआ

सीमा शर्मा मेरठी

नक़्श आँखों में उतारा जाएगा

सीमा शर्मा मेरठी

हक़ीक़त ज़ीस्त की समझा नहीं है

सीमा शर्मा मेरठी

आसमाँ भी पुकारता है मुझे

सीमा शर्मा मेरठी

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