सूरज Poetry (page 9)

मुंतज़िर दश्त-ए-दिल-ओ-जाँ है कि आहू आए

शहज़ाद अहमद

कितनी बे-नूर थी दिन भर नज़र-ए-परवाना

शहज़ाद अहमद

हाल उस का तिरे चेहरे पे लिखा लगता है

शहज़ाद अहमद

सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का

शहरयार

मिरे सूरज आ! मिरे जिस्म पे अपना साया कर

शहरयार

फिर सफ़र बे-सम्त बे-मंज़िल हुआ

शहरयार

तिलिस्म ख़त्म चलो आह-ए-बे-असर का हुआ

शहरयार

सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का

शहरयार

कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें

शहरयार

दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे

शहरयार

देख दरिया को कि तुग़्यानी में है

शहरयार

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

शहरयार

आहट जो सुनाई दी है हिज्र की शब की है

शहरयार

फ़ज़ा होती ग़ुबार-आलूदा सूरज डूबता होता

शहराम सर्मदी

साहिल पे ये टूटे हुए तख़्ते जो पड़े हैं

शहूद आलम आफ़ाक़ी

हम-सफ़र ज़ीस्त का सूरज को बनाए रक्खा

शहनाज़ नूर

निज़ाम-ए-शम्सी

शहनाज़ नबी

निशात-उस्सानिया

शहनाज़ नबी

कभी क़लम कभी नेज़ों पे सर उछलते हैं

शाहजहाँ बानो याद

याद के शहर मिरी जाँ से गुज़र

शाहिदा तबस्सुम

यूँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है

शाहिद ज़की

रात सी नींद है महताब उतारा जाए

शाहिद ज़की

बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है

शाहिद ज़की

ज़ेहन में लगता है जब ख़ुश-रंग लफ़्ज़ों का हुजूम

शाहिद मीर

मीनारों से ऊपर निकला दीवारों से पार हुआ

शाहिद मीर

एक इक मौज को सोने की क़बा देती है

शाहिद लतीफ़

कुछ तो हो रात की सरहद में उतरने की सज़ा

शाहिद कबीर

कर्ब चेहरे से मह-ओ-साल का धोया जाए

शाहिद कबीर

कैसे तोड़ी गई ये हद्द-ए-अदब पूछते हैं

शाहिद जमाल

वो बे-नियाज़ शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल गया

शाहिद अहमद शोएब

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