सूरज Poetry (page 8)

डूबते सूरज का मंज़र वो सुहानी कश्तियाँ

शमीम फ़ारूक़ी

ज़ात का गहरा अंधेरा है बिखर जा मुझ में

शकील मज़हरी

शाम मिरी कमज़ोरी है

शकील जाज़िब

हर नक़्श अधूरा है

शकील जाज़िब

ग़म का सूरज कभी ढलता ही नहीं

शकील ग्वालिआरी

बुज़-दिली होगी चराग़ों को दिखाना आँखें

शकील बदायुनी

न सोचा था ये दिल लगाने से पहले

शकील बदायुनी

तवील हिज्र है इक मुख़्तसर विसाल के बा'द

शकील आज़मी

फूल खिला दे शाख़ों पर पेड़ों को फल दे मालिक

शकील आज़मी

मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल

शकील आज़मी

एक सुराख़ सा कश्ती में हुआ चाहता है

शकील आज़मी

चाँद में ढलने सितारों में निकलने के लिए

शकील आज़मी

वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ

शकेब जलाली

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर

शकेब जलाली

चाँद-सूरज न सही एक दिया हूँ मैं भी

शाइक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

सहर ने साँस ली सूरज चमकने वाला था

शहज़ाद हुसैन साइल

कोेसा दूध

शहज़ाद हसन

वो कौन है उसे सूरज कहूँ कि रंग कहूँ

शहज़ाद अहमद

शब ढल गई और शहर में सूरज निकल आया

शहज़ाद अहमद

डूब जाता है दमकता हुआ सूरज लेकिन

शहज़ाद अहमद

दिन निकलते ही वो ख़्वाबों के जज़ीरे क्या हुए

शहज़ाद अहमद

बे-हुनर हाथ चमकने लगा सूरज की तरह

शहज़ाद अहमद

ज़मीं अपने लहू से आश्ना होने ही वाली है

शहज़ाद अहमद

ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से

शहज़ाद अहमद

उठीं आँखें अगर आहट सुनी है

शहज़ाद अहमद

उम्र जितनी भी कटी उस के भरोसे पे कटी

शहज़ाद अहमद

तुझ पे जाँ देने को तय्यार कोई तो होगा

शहज़ाद अहमद

सुकून कुछ तो मिला दिल का माजरा लिख कर

शहज़ाद अहमद

रात की नींदें तो पहले ही उड़ा कर ले गया

शहज़ाद अहमद

प्यार के रंग-महल बरसों में तय्यार हुए

शहज़ाद अहमद

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