सूरज Poetry (page 6)

आइनों में अक्स बिन कर जिन के पैकर आ गए

सुलतान निज़ामी

ज़ंग-आलूद ज़बाँ तक पहूँची होंटों की मिक़राज़

सुल्तान अख़्तर

तन्हाई की ख़लीज है यूँ दरमियान में

सुल्तान अख़्तर

कोई भी शहर में खुल कर न बग़ल-गीर हुआ

सुल्तान अख़्तर

हरा शजर न सही ख़ुश्क घास रहने दे

सुल्तान अख़्तर

न इब्तिदा-ए-जुनूँ है न इंतिहा-ए-जुनूँ

सुहैल काकोरवी

इन्द्र-धनुष बन जाएँ

सुबोध लाल साक़ी

हम ने ख़तरा मोल लिया नादानी में

सुबोध लाल साक़ी

अपनी गुमशुदगी की अफ़्वाहें मैं फैलाता रहा

सुबोध लाल साक़ी

रहबर-ए-जादा-ए-मंज़िल पे हँसी आती है

सोज़ नजीबाबादी

ख़ुशनुमा पल की गिरफ़्तारी करें

सोनरूपा विशाल

अब न कुछ सुनना न सुनाना रात गुज़रती जाती है

सिराज लखनवी

फिर सूरज ने शहर पे अपने क़हर का यूँ आग़ाज़ किया

सिराज अजमली

सफ़र की धूप ने चेहरा उजाल रक्खा था

सिदरा सहर इमरान

न पूछ मर्ग-ए-शनासाई का सबब क्या है

सिद्दीक़ मुजीबी

भूली-बिसरी बात है लेकिन अब तक भूल न पाए हम

सिद्दीक़ मुजीबी

आग देखूँ कभी जलता हुआ बिस्तर देखूँ

सिद्दीक़ मुजीबी

सहर को धुँद का ख़ेमा जला था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

ले उड़े ख़ाक भी सहरा के परस्तार मिरी

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

हर चंद कि प्यारा था मैं सूरज की नज़र का

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

बुल-हवस में भी न था वो बुत भी हरजाई न था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

आ रही थी बंद कलियों के चटकने की सदा

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

लब-ए-इज़हार पे जब हर्फ़-ए-गवाही आए

सिब्त अली सबा

साँस की आस निगहबाँ है ख़बर-दार रहो

शोहरत बुख़ारी

कुछ हश्र से कम गर्मी-ए-बाज़ार नहीं है

शोहरत बुख़ारी

जाने क्या बात है मानूस बहुत लगता है

शोहरत बुख़ारी

इक ज़माने से फ़लक ठहरा हुआ लगता है

शोहरत बुख़ारी

नख़्ल-ए-दुआ कभी जब दिल की ज़मीं से निकले

शोएब निज़ाम

हवस के बीज बदन जब से दिल में बोने लगा

शोएब निज़ाम

इक दामन में फूल भरे हैं इक दामन में आग ही आग

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

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