तौकीर Poetry (page 2)

कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या

इफ़्तिख़ार आरिफ़

कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या

इफ़्तिख़ार आरिफ़

सारी इज़्ज़त नौकरी से इस ज़माने में है 'मेहर'

हातिम अली मेहर

क़त्अ हो कर काकुल-ए-शब-गीर आधी रह गई

हातिम अली मेहर

मैं घर से ज़ेहन में कुछ सोचता निकल आया

हसन निज़ामी

मुझे विर्सा नहीं मिला

हमीदा शाहीन

फ़िक्र पाबंदी-ए-हालात से आगे न बढ़ी

हमीद नागपुरी

वो जो तेरी तलब में ईज़ा थी

हफ़ीज़ ताईब

मुलाक़ात

हबीब जालिब

बढ़ा दी इक नज़र में तू ने क्या तौक़ीर पत्थर की

हबीब मूसवी

समझते हैं जो अपने बाप की जागीर मिट्टी को

ग़ुलाम हुसैन साजिद

शोरिश-ए-ज़ंजीर बिस्मिल्लाह

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फैला अजब ग़ुबार है आईना-गाह में

एजाज़ गुल

ऐसा लगता है मुख़ालिफ़ है ख़ुदाई मेरी

बशीर सैफ़ी

मिरे हर लफ़्ज़ की तौक़ीर रहने के लिए है

बख़्श लाइलपूरी

न मंज़िल हूँ न मंज़िल-आश्ना हूँ

अतहर नफ़ीस

मैं हज्व इक अपने हर क़सीदे की रद में तहरीर कर रहा हूँ

असलम महमूद

दीवारों को दिल से बाहर रखने वाले

असलम बदर

मिरे दिल को ज़ुल्फ़ों की ज़ंजीर कीजो

आसिफ़ुद्दौला

अपना घर बाज़ार में क्यूँ रख दिया

अासिफ़ा निशात

जमाल-ए-यार को तस्वीर करने वाले थे

अासिफ़ शफ़ी

इक शख़्स अपने हाथ की तहरीर दे गया

असग़र राही

हम तो आवारा-ए-सहरा हैं हमें क्या मतलब

अर्शी भोपाली

रक़्स-ए-आशुफ़्ता-सरी की कोई तदबीर सही

अर्शी भोपाली

आँखों में ख़्वाब रख दिए ता'बीर छीन ली

अरशद जमाल हश्मी

हुज़ूर-ए-ग़ैर तुम उश्शाक़ की तहक़ीर करते हो

अरशद अली ख़ान क़लक़

अपने अहबाब को अशआ'र सुनाने निकला

आरिफ़ अंसारी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

आओ देखें अहल-ए-वफ़ा की होती है तौक़ीर कहाँ

अनवर मोअज़्ज़म

कहो क्या मेहरबाँ ना-मेहरबाँ तक़दीर होती है

अंजुम ख़लीक़

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