तेग Poetry (page 11)

कहता है कौन हिज्र मुझे सुब्ह ओ शाम हो

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या

बासिर सुल्तान काज़मी

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

लाख पर्दे से रुख़-ए-अनवर अयाँ हो जाएगा

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

गया शबाब न पैग़ाम-ए-वस्ल-ए-यार आया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

हिन्द के जाँ-बाज़ सिपाही

बर्क़ देहलवी

जो जहाँ के आइना हैं दिल उन्हों के सादा हैं

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

कुफ़्र एक रंग-ए-क़ुदरत-ए-बे-इंतिहा में है

बहराम जी

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा

ज़फ़र

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

ज़फ़र

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

होते होते चश्म से आज अश्क-बारी रह गई

ज़फ़र

निशान-ए-ज़ख़्म पे निश्तर-ज़नी जो होने लगी

बद्र-ए-आलम ख़लिश

भड़क उट्ठेंगे शो'ले एक दिन दुनिया की महफ़िल में

अज़ीज़ लखनवी

वो तवानाई कहाँ जो कल तलक आज़ा में थी

अतीक़ुल्लाह

तिफ़्ली के ख़्वाब

असरार-उल-हक़ मजाज़

सानेहा

असरार-उल-हक़ मजाज़

नौ-जवान से

असरार-उल-हक़ मजाज़

लखनऊ

असरार-उल-हक़ मजाज़

इधर भी आ

असरार-उल-हक़ मजाज़

देख के अर्ज़ां लहू सुर्ख़ी-ए-मंज़र ख़मोश

असलम महमूद

आता है तेग़ हाथ में वो जंग-जू लिए

आसिफ़ुद्दौला

बस-कि दीदार तिरा जल्वा-ए-क़ुद्दूसी है

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

तिरे जल्वों के आगे हिम्मत-ए-शरह-ओ-बयाँ रख दी

असग़र गोंडवी

कम न थी तेग़ से अदा-ए-ख़िराम

आरज़ू लखनवी

पियूँ ही क्यूँ जो बुरा जानूँ और छुपा के पियूँ

आरज़ू लखनवी

हम आज खाएँगे इक तीर इम्तिहाँ के लिए

आरज़ू लखनवी

ये बारीक उन की कमर हो गई

अरशद अली ख़ान क़लक़

साफ़ बातों से हो गया मा'लूम

अरशद अली ख़ान क़लक़

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