वीरानी Poetry (page 4)

उस के नाम जिसे तारीकी निगल चुकी

इंजिला हमेश

सस्ती नज़्म

इंजील सहीफ़ा

मेरा और फूलों का रिश्ता टूट गया

इलियास बाबर आवान

हाथ लहराता रहा वो बैठ कर खिड़की के साथ

इफ़्तिख़ार नसीम

शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

रब्त असीरों को अभी उस गुल-ए-तर से कम है

इदरीस बाबर

चाँद के तमन्नाई

इब्न-ए-इंशा

जैसे कोई ज़िद्दी बच्चा कब बहले बहलाने से

हुमैरा रहमान

जिसे मिलें वही तन्हा दिखाई देता है

हीरानंद सोज़

अश्क की ऐसी फ़रावानी पे रश्क आता है

हस्सान अहमद आवान

हो तेरी याद का दिल में गुज़र आहिस्ता आहिस्ता

हसन अकबर कमाल

ख़्वाब अपने मिरी आँखों के हवाले कर के

हसन अब्बासी

ऐ यास जो तू दिल में आई सब कुछ हुआ पर कुछ भी न हुआ

हक़ीर

क्या नज़र की हुश्यारी ख़ुद-असीर-ए-मस्ती है

हनीफ़ फ़ौक़

हम इस ख़ातिर तिरी तस्वीर का हिस्सा नहीं थे

हम्माद नियाज़ी

यक़ीन की सल्तनत थी और सुल्तानी हमारी

हम्माद नियाज़ी

जिस की सौंधी सौंधी ख़ुशबू आँगन आँगन पलती थी

हम्माद नियाज़ी

दिल की याद-दहानी से

हम्माद नियाज़ी

मैं वो बस्ती हूँ कि याद-ए-रफ़्तगाँ के भेस में

हफ़ीज़ जालंधरी

है अज़ल की इस ग़लत बख़्शी पे हैरानी मुझे

हफ़ीज़ जालंधरी

तेज़ हवाओ अब डरना घबराना कैसा

गुलज़ार वफ़ा चौदरी

शक्ल सहरा की हमेशा जानी-पहचानी रहे

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

रफ़्ता रफ़्ता आँखों को हैरानी दे कर जाएगा

ग़ज़नफ़र

रफ़्ता रफ़्ता आँखों को हैरानी दे कर जाएगा

ग़ज़नफ़र

ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है

ग़ालिब

कोई वीरानी सी वीरानी है

ग़ालिब

सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का

ग़ालिब

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया

ग़ालिब

नहीं है ज़ख़्म कोई बख़िये के दर-ख़ुर मिरे तन में

ग़ालिब

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