याद Poetry (page 26)

कार-ए-बेहूदा

शहराम सर्मदी

वो एक लम्हा-ए-रफ़्ता भी क्या बुला लाया

शहराम सर्मदी

तो क्या तड़प न थी अब के मिरे पुकारे में

शहराम सर्मदी

मैं नहीं रोता हूँ अब ये आँख रोती है मुझे

शहराम सर्मदी

ख़ला सा ठहरा हुआ है ये चार-सू कैसा

शहराम सर्मदी

हमारे ज़ेहन में ये बात भी नहीं आई

शहराम सर्मदी

ब-राह-ए-रास्त नहीं फिर भी राब्ता सा है

शहराम सर्मदी

हम-सफ़र ज़ीस्त का सूरज को बनाए रक्खा

शहनाज़ नूर

पाप

शहनाज़ नबी

हुसैन! तोमी कोथाए

शहनाज़ नबी

मिरी तरह से कहीं ख़ाक छानता होगा

शहनाज़ मुज़म्मिल

तेरी तख़्लीक़ तिरा रंग हवाला था मिरा

शहनवाज़ ज़ैदी

सूरज तिरी दहलीज़ में अटका हुआ निकला

शहनवाज़ ज़ैदी

शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की दवा मैं क्या करता

शहनवाज़ ज़ैदी

वफ़ा-परस्त जहान-ए-वफ़ा को ले डूबे

शाहजहाँ बानो याद

अक़्ल-ओ-दिल को मिला-जुला रखिए

शाहजहाँ बानो याद

मैं ज़हर रही हर शाम रही

शाहिदा तबस्सुम

सितारा-चश्म है और मेहरबाँ है

शाहिदा हसन

सबब क्या है कभी समझी नहीं मैं

शाहिदा हसन

कोई तारा न दिखा शाम की वीरानी में

शाहिदा हसन

बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है

शाहिद ज़की

अब तिरी याद से वहशत नहीं होती मुझ को

शाहिद ज़की

मीनारों से ऊपर निकला दीवारों से पार हुआ

शाहिद मीर

ख़ौफ़ से अब यूँ न अपने घर का दरवाज़ा लगा

शाहिद मीर

वो क्यूँ आया

शाहिद मलिक

आज भी जिस की है उम्मीद वो कल आए हुए

शाहिद लतीफ़

फ़िक्र-ए-ईजाद में हूँ खोल नया दर कोई

शाहिद कमाल

दश्त-ए-वहशत को फिर आबाद करूँगा इक दिन

शाहिद कमाल

सियाह सफ़्हा-ए-हस्ती पे मैं उभर न सका

शाहिद कलीम

एक तुम्हारे प्यार की ख़ातिर जग के दुख अपनाए थे

शाहिद इश्क़ी

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