याद Poetry (page 25)

यूँ ख़ाक की मानिंद न राहों पे बिखर जा

शहज़ाद अहमद

रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया

शहज़ाद अहमद

कितनी बे-नूर थी दिन भर नज़र-ए-परवाना

शहज़ाद अहमद

कब तक कड़कती धूप में आँखें जलाएँ हम

शहज़ाद अहमद

हिज्र की रात मिरी जाँ पे बनी हो जैसे

शहज़ाद अहमद

हाल उस का तिरे चेहरे पे लिखा लगता है

शहज़ाद अहमद

दिल-ए-फ़सुर्दा उसे क्यूँ गले लगा न लिया

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

बाग़-ए-बहिश्त के मकीं कहते हैं मर्हबा मुझे

शहज़ाद अहमद

आप भी नहीं आए नींद भी नहीं आई

शहज़ाद अहमद

तुझे भूल गया कभी याद नहीं करता तुझ को

शहरयार

शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है

शहरयार

मैं सोचता हूँ मगर याद कुछ नहीं आता

शहरयार

अक्स-ए-याद-ए-यार को धुँदला किया है

शहरयार

ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं

शहरयार

अब जी के बहलने की है एक यही सूरत

शहरयार

वो मोड़

शहरयार

एक और साल गिरह

शहरयार

ज़ख़्मों को रफ़ू कर लें दिल शाद करें फिर से

शहरयार

ये जगह अहल-ए-जुनूँ अब नहीं रहने वाली

शहरयार

तिलिस्म ख़त्म चलो आह-ए-बे-असर का हुआ

शहरयार

तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा

शहरयार

तेरे सिवा भी कोई मुझे याद आने वाला था

शहरयार

तमाम ख़ल्क़-ए-ख़ुदा देख के ये हैराँ है

शहरयार

किस फ़िक्र किस ख़याल में खोया हुआ सा है

शहरयार

हवा का ज़ोर ही काफ़ी बहाना होता है

शहरयार

ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं

शहरयार

आहट जो सुनाई दी है हिज्र की शब की है

शहरयार

तुम अपनी सब्ज़ आँखें बंद कर लो

शहराम सर्मदी

कार-ए-जहाँ दराज़ है

शहराम सर्मदी

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