ज़बां Poetry (page 11)

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

क्या कहूँ कब धुआँ नहीं उठता

शाह हुसैन नहरी

तीर ख़त्म हैं तो क्या हाथ में कमाँ रखना

शफ़ीक़ सलीमी

मौसम-ए-गुल है न दौर-जाम-ओ-सहबा रह गया

शफ़ीक़ जौनपुरी

इक कार-ए-गराँ है खेल नहीं

शफ़ीक़ देहलवी

शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस

शाद लखनवी

दिल की कहूँ या कहूँ जिगर की

शाद लखनवी

ऐ बद-गुमाँ तिरा है गुमाँ और की तरफ़

शाद लखनवी

जफ़ा-शिआ'र भी हो कोई मेहरबाँ भी रहे

शाद बिलगवी

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

शाद अज़ीमाबादी

जिए जाएँगे हम भी लब पे दम जब तक नहीं आता

शाद अज़ीमाबादी

अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया

शाद अज़ीमाबादी

वहाँ भी ज़हर-ज़बाँ काम कर गया होगा

शबनम शकील

सामने इक बे-रहम हक़ीक़त नंगी हो कर नाचती है

शबनम शकील

जेहल को इल्म का मेआ'र समझ लेते हैं

शायर लखनवी

वो कहाँ वक़्त कि मोड़ेंगे इनाँ और तरफ़

शानुल हक़ हक़्क़ी

ईमा-ए-ग़ज़ल करती हैं मौसम की अदाएँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

ज़ब्त-ए-नावक-ए-ग़म से बात बन तो सकती है

शाद आरफ़ी

चमन को आग लगाने की बात करता हूँ

शाद आरफ़ी

यही बस एक दुआ माँगना नहीं आता

सीन शीन आलम

फिर आ गया ज़बाँ पे वही नाम क्या करें

सीमाब सुल्तानपुरी

अल्लाह दे सके तो दे ऐसी ज़बाँ मुझे

सीमाब सुल्तानपुरी

वो दुनिया थी जहाँ तुम बंद करते थे ज़बाँ मेरी

सीमाब अकबराबादी

ये किस ने शाख़-ए-गुल ला कर क़रीब-ए-आशियाँ रख दी

सीमाब अकबराबादी

जो सालिक है तो अपने नफ़्स का इरफ़ान पैदा कर

सीमाब अकबराबादी

जरस है कारवान-ए-अहल-ए-आलम में फ़ुग़ाँ मेरी

सीमाब अकबराबादी

इजाज़त दे कि अपनी दास्तान-ए-ग़म बयाँ कर लें

सीमाब अकबराबादी

मेरे ख़तों को जलाने से कुछ नहीं होगा

सीमा शर्मा मेरठी

कुछ भी न अब कहेंगे क़फ़स में ज़बाँ से हम

सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी

कुछ भी न अब कहेंगे क़फ़स में ज़बाँ से हम

सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी

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