ज़बां Poetry (page 9)

किसी का तीर किसी की कमाँ हो ठीक नहीं

शमीम अब्बास

इक्का दुक्का शाज़-ओ-नादिर बाक़ी हैं

शमीम अब्बास

बड़ी सर्द रात थी कल मगर बड़ी आँच थी बड़ा ताव था

शमीम अब्बास

ज़िंदगी यूँ तो बहुत अय्यार थी चालाक थी

शकील शम्सी

मुझ को तिरे ख़याल से वहशत कभी न थी

शकील जाज़िब

ये सिलसिला ग़मों का न जाने कहाँ से है

शकील ग्वालिआरी

आज उस बज़्म में यूँ दाद-ए-वफ़ा दी जाए

शकील ग्वालिआरी

उन के बग़ैर हम जो गुलिस्ताँ में आ गए

शकील बदायुनी

नुमायाँ दोनों जानिब शान-ए-फ़ितरत होती जाती है

शकील बदायुनी

कोई आरज़ू नहीं है कोई मुद्दआ' नहीं है

शकील बदायुनी

इहानत-ए-दिल-ए-सब्र-आज़मा नहीं करते

शकील बदायुनी

हम उन की अंजुमन का समाँ बन के रह गए

शकील बदायुनी

हंगामा-ए-ग़म से तंग आ कर इज़हार-ए-मसर्रत कर बैठे

शकील बदायुनी

आदाब-ए-आशिक़ी से बेगाना कह रही है

शकील बदायुनी

ज़िंदा रहना है तो साँसों का ज़ियाँ और सही

शकील आज़मी

लगा लिया था गले उस ने बा-वफ़ा कह कर

शकेब अयाज़

झोंका हवा का अध-खुली खिड़की तक आ न जाए

शकेब अयाज़

कई दीवान कह चुका 'हातिम'

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तुम्हारे इश्क़ में हम नंग-ओ-नाम भूल गए

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

फिर ख़बर इस फ़स्ल में यारो बहार आने की है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

क्या सताते हो रहो बंदा-नवाज़

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जिस को देखा सो यहाँ दुश्मन-ए-जाँ है अपना

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इश्क़ में पास-ए-जाँ नहीं है दुरुस्त

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हर गुल उस बाग़ का नज़रों में दहाँ है गोया

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

बे तिरे जान न थी जान मिरी जान के बीच

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

अब की चमन में गुल का ने नाम ओ ने निशाँ है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

सोचिए गर उसे हर नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

न पूछ मेरी कहानी कहाँ से निकली है

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

ये अलग बात ज़बाँ साथ न दे पाएगी

शहज़ाद अहमद

वो कौन है उसे सूरज कहूँ कि रंग कहूँ

शहज़ाद अहमद

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