ज़बां Poetry (page 10)
ज़मीं अपने लहू से आश्ना होने ही वाली है
शहज़ाद अहमद
ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से
शहज़ाद अहमद
सुकून कुछ तो मिला दिल का माजरा लिख कर
शहज़ाद अहमद
सब्त है चेहरों पे चुप बन में अंधेरा हो चुका
शहज़ाद अहमद
मैं कि ख़ुश होता था दरिया की रवानी देख कर
शहज़ाद अहमद
कहीं भी साया नहीं किस तरफ़ चले कोई
शहज़ाद अहमद
कब तक कड़कती धूप में आँखें जलाएँ हम
शहज़ाद अहमद
इस दौर-ए-बे-दिली में कोई बात कैसे हो
शहज़ाद अहमद
इबलीस भी रख लेते हैं जब नाम फ़रिश्ते
शहज़ाद अहमद
गुम-शुदा
शहरयार
अब के बरस
शहरयार
सुन रखा था तजरबा लेकिन ये पहला था मिरा
शहराम सर्मदी
है मिरा रंग-ए-सुख़न रंग-ए-बयाँ कुछ मुख़्तलिफ़
शाहिदा लतीफ़
मिले जो नाक़ा-ए-वहशत को सारबाँ कोई
शाहिदा हसन
लम्स आहट के हवाओं के निशाँ कुछ भी नहीं
शाहिदा हसन
यूँ तो नहीं कि पहले सहारे बनाए थे
शाहिद ज़की
ज़ख़्म-ए-जिगर को दस्त-ए-जराहत से पूछिए
शाहिद कमाल
कुछ देर काली रात के पहलू में लेट के
शाहिद कबीर
मिरे क़रीब से गुज़रा इक अजनबी की तरह
शाहिद इश्क़ी
हर मर्ग-ए-आरज़ू का निशाँ देर तक रहा
शाहिद इश्क़ी
ज़िंदगी पाने की हसरत है तो मरता क्यूँ है
शाहिद अहमद शोएब
मिज़ाज-ए-गर्दिश-ए-दौराँ वही समझते हैं
शाहीन ग़ाज़ीपुरी
मेरी चाहत पे न इल्ज़ाम लगाओ लोगो
शाहीन ग़ाज़ीपुरी
बोलते बोलते जब सिर्फ़ ज़बाँ रह गए हम
शाहीन अब्बास
इस धूप से क्या गिला है मुझ को
शहाब जाफ़री
बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम
शहाब जाफ़री
'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की तरह सेहर-बयाँ से निकले
शहाब अख़्तर
हो गुफ़्तुगू हमारी और अब उस की क्यूँकि आह
शाह नसीर
जब तलक चर्ब न जूँ शम्-ए-ज़बाँ कीजिएगा
शाह नसीर
दिखा दो गर माँग अपनी शब को तो हश्र बरपा हो कहकशाँ पर
शाह नसीर
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