घाव Poetry (page 9)

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार

शाज़ तमकनत

सिमट सिमट सी गई थी ज़मीं किधर जाता

शाज़ तमकनत

शब-ए-वा'दा कह गई है शब-ए-ग़म दराज़ रखना

शाज़ तमकनत

जिन ज़ख़्मों पर था नाज़ हमें वो ज़ख़्म भी भरते जाते हैं

शाज़ तमकनत

जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर

शाज़ तमकनत

शिकोह-ए-ज़ात से दुश्मन का लश्कर काँप जाता है

शायान क़ुरैशी

शाम के ढलते सूरज ने ये बात मुझे समझाई है

शायान क़ुरैशी

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

बिखरी थी हर सम्त जवानी रात घनेरी होने तक

शायान क़ुरैशी

न दे साक़ी मुझे कुछ ग़म नहीं है

शौक़ बहराइची

शुऊ'र-ए-कैफ़-ओ-ख़ुशी है ज़रा ठहर जाओ

शौकत परदेसी

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं

शारिक़ कैफ़ी

पहुँच गया था वो कुछ इतना रौशनी के क़रीब

शारिब मौरान्वी

कुछ भी हो उस से जुदाई का सबब घर जाओ

शरीफ़ अहमद शरीफ़

कुछ इस तरह वो निगाहें चुराए जाते हैं

शम्स ज़ुबैरी

दूर फ़ज़ा में एक परिंदा खोया हुआ उड़ानों में

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

चाँद तारों ने भी जब रख़्त-ए-सफ़र खोला है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

पलकों पे सितारा सा मचलने के लिए था

शमीम रविश

ज़हर को मय दिल-ए-सद-पारा को मीना न कहो

शमीम करहानी

ख़ुद कोई चाक-गरेबाँ है रग-ए-जाँ के क़रीब

शमीम करहानी

गुलों पे साया-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार मिले

शमीम करहानी

बचाओ दामन-ए-दिल ऐसे हम-नशीनों से

शमीम करहानी

रोज़ शाम होती है रोज़ हम सँवरते हैं

शकीला बानो

जो शख़्स मुद्दतों मिरे शैदाइयों में था

शकीला बानो

मसअला ख़त्म हुआ चाहता है

शकील जमाली

ये तिरी ख़ल्क़-नवाज़ी का तक़ाज़ा भी नहीं

शकील जमाली

सारे भूले बिसरों की याद आती है

शकील जमाली

मसअला ख़त्म हुआ चाहता है

शकील जमाली

आदमी न इतना भी दूर हो ज़माने से

शकील बदायुनी

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