धरती Poetry (page 7)

हाथ आ सका है सिलसिला-ए-जिस्म-ओ-जाँ कहाँ

सहर अंसारी

क्यूँ हर उरूज को यहाँ आख़िर ज़वाल है

सग़ीर मलाल

जिसे सुनाओगे पहले ही सुन चुका होगा

सग़ीर मलाल

फ़क़त ज़मीन से रिश्ते को उस्तुवार किया

सग़ीर मलाल

इक्कीसवीं सदी का आदमी

साग़र ख़य्यामी

बहार आई है फिर पैरहन गुलाबी हो

सफ़दर मीर

नज़्म

सईदुद्दीन

नया फ़्रेम

सईदुद्दीन

मासूमियत

सईदुद्दीन

च्यूंटियाँ

सईदुद्दीन

फ़सील-ए-ज़ात में दर तो तिरी इनायत है

सईद नक़वी

ये हादसा भी तो कुछ कम न था सबा के लिए

सईद अहमद अख़्तर

इस घूमती ज़मीन का मेहवर ही तोड़ दो

सादिक़

मुँह आँसुओं से अपना अबस धो रहे हो क्यूँ

सादिक़

फ़स्ल बोई भी हम ने काटी भी

साबिर

मुख़्तसर ही सही मयस्सर है

साबिर

ये किस हसीन ने लोगों को रोक रक्खा है

रूही कंजाही

इस शोला-ख़ू की तरह बिगड़ता नहीं कोई

रूही कंजाही

हज़ार रंग जलाल-ओ-जमाल के देखे

रूही कंजाही

ज़बान पे नाला-ओ-फ़रियाद के सिवा क्या है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

वो अपनी आन में गुम है मैं अपनी आन में गुम

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

वक़ार-ए-शाह-ए-ज़विल-इक्तदार देख चुके

रिन्द लखनवी

नीस्त बे-यार मुझ को हस्ती है

रिन्द लखनवी

सब होत न होत से नथरी हुई आसान ग़ज़ल हूँ छा के सुनो

रउफ़ रज़ा

ता-ब-कै मंज़िल-ब-मंज़िल हम मुसाफ़िर भागते

रऊफ़ ख़ैर

अब इस से पहले कि तन मन लहू लहू हो जाए

रऊफ़ ख़ैर

ग़म की बस्ती अजीब बस्ती है

रतन पंडोरवी

लोग कि जिन को था बहुत ज़ोम-ए-वजूद शहर में

राशिद मुफ़्ती

इक ख़याल-अफ़रोज़ मौज आई तो थी

राशिदा माहीन मलिक

मेरे लिए तो हर्फ़-ए-दुआ हो गया वो शख़्स

रशीद क़ैसरानी

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