जीवन Poetry (page 20)

एक मुजर्रब नुस्ख़ा

शौकत आबिदी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

मिरे दिल पे तेरा क़ब्ज़ा मिरा इख़्तियार तू है

शातिर हकीमी

इस क़दर पाएमाल हैं हम लोग

शातिर हकीमी

दर्द में जब कमी सी होती है

शातिर हकीमी

वो बकरा फिर अकेला पड़ गया है

शारिक़ कैफ़ी

ख़ाक को मैं ख़्वार क्यूँ करता

शारिक़ कैफ़ी

जनाज़े में तो आओगे न मेरे

शारिक़ कैफ़ी

फ़क़त हिस्से की ख़ातिर

शारिक़ कैफ़ी

ये कुछ बदलाव सा अच्छा लगा है

शारिक़ कैफ़ी

ये चुपके चुपके न थमने वाली हँसी तो देखो

शारिक़ कैफ़ी

बड़ा है दुख सो हासिल है ये आसानी मुझे

शारिक़ कैफ़ी

पर्दा-ए-रुख़ क्या उठा हर-सू उजाले हो गए

शारिब मौरान्वी

पहुँच गया था वो कुछ इतना रौशनी के क़रीब

शारिब मौरान्वी

सब्ज़ सूरज की किरन

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

न कोई अपना ग़म है और न अब कोई ख़ुशी अपनी

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

मिली जो दिल को ख़ुशी तो ख़ुशी से घबराए

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

मिरे ए'तिमाद को ग़म मिला मिरी जब किसी पे नज़र गई

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

पहुँचा मैं कू-ए-यार में जब सर लिए हुए

शमीम तारिक़

हिचकियाँ लेता हुआ दुनिया से दीवाना चला

शमीम तारिक़

दूर तक फैली हुई है तीरगी बातें करो

शमीम रविश

आँखों में हिज्र चेहरे पे ग़म की शिकन तो है

शमीम रविश

मंज़र यूँ था

शमीम क़ासमी

एक इंच मुस्कुराहट

शमीम क़ासमी

नया लहजा ग़ज़ल का मिस्रा-ए-सानी में रक्खा है

शमीम क़ासमी

ज़बाँ को हुक्म ही कहाँ कि दास्तान-ए-ग़म कहें

शमीम करहानी

ये ख़ुशी ग़म-ए-ज़माना का शिकार हो न जाए

शमीम करहानी

याद की सुब्ह ढल गई शौक़ की शाम हो गई

शमीम करहानी

क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात से हम को छुड़ा लिया

शमीम करहानी

माना कि सई-ए-इश्क़ का अंजाम-कार क्या

शमीम करहानी

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