जीवन Poetry (page 62)

गूँजता शहरों में तन्हाई का सन्नाटा तो है

बाक़र मेहदी

बहुत ज़ी-फ़हम हैं दुनिया को लेकिन कम समझते हैं!

बाक़र मेहदी

औरों पे इत्तिफ़ाक़ से सब्क़त मिली मुझे

बाक़र मेहदी

अजीब दिल में मिरे आज इज़्तिराब सा है!

बाक़र मेहदी

अब ख़ानुमाँ-ख़राब की मंज़िल यहाँ नहीं

बाक़र मेहदी

लब-ए-जाँ-बख़्श के मीठे का तेरे जो मज़ा पाया

बाक़र आगाह वेलोरी

ज़िंदगी से ज़िंदगी रूठी रही

बक़ा बलूच

क्या कहें क्या हुस्न का आलम रहा

बक़ा बलूच

मार देती है ज़िंदगी ठोकर

बलवान सिंह आज़र

खुला मकान है हर एक ज़िंदगी 'आज़र'

बलवान सिंह आज़र

मिरे सफ़र में ही क्यूँ ये अज़ाब आते हैं

बलवान सिंह आज़र

ये ज़र्द बच्चे

बलराज कोमल

ड्रग स्टोर

बलराज कोमल

सदियों का कर्ब लम्हों के दिल में बसा दिया

बलराज हयात

कहीं भी ज़िंदगी अपनी गुज़ार सकता था

लराज बख़्शी

कहाँ से मंज़र समेट लाए नज़र कहाँ से उधार माँगे

लराज बख़्शी

जान ले ले न ज़ब्त-ए-आह कहीं

बकुल देव

तिश्नगी-ए-लब पे हम अक्स-ए-आब लिक्खेंगे

बख़्श लाइलपूरी

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

ज़फ़र

बुरा हो कर भी वो अच्छा बहुत है

बद्र वास्ती

टपकते शो'लों की बरसात में नहाउँगा

बदनाम नज़र

गुम-शुदा मौसम का आँखों में कोई सपना सा था

बदनाम नज़र

दीवार-ओ-दर का नाम था कोई मकाँ न था

बदनाम नज़र

कब बयाबाँ राह में आया ये समझा ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

जले हैं दिल न चराग़ों ने रौशनी की है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

आग ही काश लग गई होती

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

हिज्र में जो अश्क-ए-चश्म-ए-तर गिरा

बदर जमाली

वही जिंस-ए-वफ़ा आख़िर फ़राहम होती जाती है

बीएस जैन जौहर

टुकड़ों में बटी हुई ज़िंदगी

अज़रा अब्बास

इस ज़िंदगी के बदले

अज़रा अब्बास

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