जीवन Poetry (page 61)

ज़र्रों में कुनमुनाती हुई काएनात हूँ

बशीर बद्र

वो अपने घर चला गया अफ़्सोस मत करो

बशीर बद्र

शो'ला-ए-गुल गुलाब शो'ला क्या

बशीर बद्र

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा

बशीर बद्र

मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई

बशीर बद्र

मिरी नज़र में ख़ाक तेरे आइने पे गर्द है

बशीर बद्र

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

बशीर बद्र

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए

बशीर बद्र

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है

बशीर बद्र

इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को

बशीर बद्र

अज़्मतें सब तिरी ख़ुदाई की

बशीर बद्र

जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया

बशीरुद्दीन राज़

हुई मुद्दतें ऐ दिल-ए-हज़ीं न पयाम है न सलाम है

बशीरुद्दीन राज़

मुझे जीना नहीं आता

बशर नवाज़

जाने क्या देखा था मैं ने ख़्वाब में

बशर नवाज़

छेड़ा ज़रा सबा ने तो गुलनार हो गए

बशर नवाज़

बाज़ार-ए-ज़िंदगी में जमे कैसे अपना रंग

बशर नवाज़

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया

बशर नवाज़

ब-हर-उनवाँ मोहब्बत को बहार-ए-ज़िंदगी कहिए

बशर नवाज़

कहता है हर मकीं से मकाँ बोलते रहो

बाक़ी सिद्दीक़ी

बहुत जल्दी थी घर जाने की लेकिन

बाक़ी अहमदपुरी

मुझे तो इश्क़ में अब ऐश-ओ-ग़म बराबर है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सैलाब-ए-ज़िंदगी के सहारे बढ़े चलो

बाक़र मेहदी

मेरे सनम-कदे में कई और बुत भी हैं

बाक़र मेहदी

ये रात

बाक़र मेहदी

धरती का बोझ

बाक़र मेहदी

बहुत है एक नज़र

बाक़र मेहदी

ज़र्रे का राज़ मेहर को समझाना चाहिए

बाक़र मेहदी

क्या क्या नहीं किया मगर उन पर असर नहीं

बाक़र मेहदी

ख़बर सुनेगा मिरी मौत की तो ख़ुश होगा

बाक़र मेहदी

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