जीवन Poetry (page 83)

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे

अहमद फ़राज़

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया

अहमद फ़राज़

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब

अहमद फ़राज़

अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइए

अहमद फ़राज़

ज़ेर-ए-लब

अहमद फ़राज़

सवाल

अहमद फ़राज़

मयूरका

अहमद फ़राज़

हमदर्द

अहमद फ़राज़

भली सी एक शक्ल थी

अहमद फ़राज़

ये बे-दिली है तो कश्ती से यार क्या उतरें

अहमद फ़राज़

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ

अहमद फ़राज़

तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तिरी दुहाई न दूँ

अहमद फ़राज़

शो'ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो

अहमद फ़राज़

न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो

अहमद फ़राज़

न दिल से आह न लब से सदा निकलती है

अहमद फ़राज़

क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे

अहमद फ़राज़

कशीदा सर से तवक़्क़ो अबस झुकाव की थी

अहमद फ़राज़

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम

अहमद फ़राज़

चारागरों ने बाँध दिया मुझ को बख़्त से

अहमद फ़क़ीह

हम आस्तान-ए-ख़ुदा-ए-सुख़न पे बैठे थे

अहमद अता

दोनों के जो दरमियाँ ख़ला है

अहमद अता

वफ़ा कम है नज़र आती बहुत है

अहमद अल्वी

इब्न-ए-आदम बरसर पैकार है

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

हिंसा के पहले मुझे फिर रुला गया इक शख़्स

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

अम्न-ओ-सुल्ह-ओ-आश्ती हो जैसे बीमारी का नाम

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

बे-हिसी इंसान का हासिल न हो

आग़ाज़ बरनी

कलेजे में हज़ारों दाग़ दिल में हसरतें लाखों

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

न निकला मुँह से कुछ निकली न कुछ भी क़ल्ब-ए-मुज़्तर की

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

गिरी गिर कर उठी पलटी तो जो कुछ था उठा लाई

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

ये भी शायद ज़िंदगी की इक अदा है दोस्तो

अफ़ज़ल मिनहास

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