ज़ुल्फ़ Poetry (page 27)

हम भी थे गोशा-गीर कि गुमनाम थे बहुत

अासिफ़ जमाल

भूले हुए हैं सब कि है कार-ए-जहाँ बहुत

अासिफ़ जमाल

उठ चुका दिल मिरा ज़माने से

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

हैफ़ दिल में तिरे वफ़ा न हुई

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

बस-कि दीदार तिरा जल्वा-ए-क़ुद्दूसी है

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

बहार आई है सोते को टुक जगा देना

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

आ जाओ अब तो ज़ुल्फ़ परेशाँ किए हुए

अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन

उठाओ संग कि हम में सनक बहुत है अभी

अशफ़ाक़ अंजुम

सुनो कुछ दीदा-ए-नम बोलते हैं

असग़र वेलोरी

गुलशन गुलशन शोला-ए-गुल की ज़ुल्फ़-ए-सबा की बात चली

असग़र सलीम

गुलशन गुलशन शो'ला-ए-गुल की ज़ुल्फ़-ए-सबा की बात चली

असग़र सलीम

हुस्न को वुसअतें जो दीं इश्क़ को हौसला दिया

असग़र गोंडवी

असरार-ए-इश्क़ है दिल-ए-मुज़्तर लिए हुए

असग़र गोंडवी

किस तरह आए तिरी बज़्म-ए-तरब में आइना

असीर लखनवी

निगह-ए-शौक़ को यूँ आइना-सामानी दे

असर लखनवी

न शरह-ए-शौक़ न तस्कीन जान-ए-ज़ार में है

असर लखनवी

तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा

असद भोपाली

रक़्स-ए-आशुफ़्ता-सरी की कोई तदबीर सही

अर्शी भोपाली

रुख़ तह-ए-ज़ुल्फ़ है और ज़ुल्फ़ परेशाँ सर पर

अरशद अली ख़ान क़लक़

रग-ओ-पै में भरा है मेरे शोर उस की मोहब्बत का

अरशद अली ख़ान क़लक़

इश्क़ में तेरे जान-ए-ज़ार हैफ़ है मुफ़्त में चली

अरशद अली ख़ान क़लक़

हैं तेग़-ए-नाज़-ए-यार के बिस्मिल अलग अलग

अरशद अली ख़ान क़लक़

गुलों पर साफ़ धोका हो गया रंगीं कटोरी का

अरशद अली ख़ान क़लक़

बुत-परस्ती ने किया आशिक़-ए-यज़्दाँ मुझ को

अरशद अली ख़ान क़लक़

आएँगे वो तो आप में हरगिज़ न आएँगे

अरशद अली ख़ान क़लक़

तिरे बाज़ूओं का सहारा तो ले लूँ मगर उन में भी रच गई है थकन

आरिफ़ अब्दुल मतीन

तिरे बाज़ुओं का सहारा तो ले लूँ मगर इन में भी रच गई है थकन

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मेरी सोच लरज़ उट्ठी है देख के प्यार का ये आलम

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मताअ-ओ-माल न दे दौलत-ए-तबाही दे

अक़ील शादाब

आया न आब-ए-रफ़्ता कभी जूएबार में

अनवापुल हसन अनवार

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