आग Poetry (page 12)

ज़र-ए-सरिश्क फ़ज़ा में उछालता हुआ मैं

शाहिद ज़की

यूँ तो नहीं कि पहले सहारे बनाए थे

शाहिद ज़की

तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं

शाहिद ज़की

सीने की मिसाल आग है चाँदी सा धुआँ है

शाहिद शैदाई

वक़्फ़ा

शाहिद माहुली

कुछ दर्द बढ़ा है तो मुदावा भी हुआ है

शाहिद माहुली

ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया

शाहिद कबीर

ग़ैर की आग में कोई भी न जलना चाहे

शाहिद इश्क़ी

इक न आने वाले का इंतिज़ार करते हैं

शाहिद इश्क़ी

मेरे दिल में घर भी बनाता रहता है

शाहिद ग़ाज़ी

मुज़्तरिब सा रहता है मुझ से बात करते वक़्त

शाहिद फ़रीद

साज़-ए-दिल साज़-ए-जुनूँ साज़-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं

शाहिद भोपाली

आप के इज़्न-ए-मुलाक़ात से जी डरता है

शाहिद अख़्तर

दम अजनबी सदाओं का भरते हो साहिबो

शाहिद अहमद शोएब

ज़िंदगी है मुख़्तसर आहिस्ता चल

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

पहले तो मिट्टी का और पानी का अंदाज़ा हुआ

शाहीन अब्बास

इब्तिदा सा कुछ इंतिहा सा कुछ

शाहीन अब्बास

अब ऐसे चाक पर कूज़ा-गरी होती नहीं थी

शाहीन अब्बास

बीनाई को पलकों से हटाने की पड़ी है

शहाब सफ़दर

सूरज का शहर

शहाब जाफ़री

हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का मौसम निकल गया

शहाब जाफ़री

हयात में भी अजल का समाँ दिखाई दे

शहाब जाफ़री

मुझ को शाम-ए-हिज्र की ये जल्वा-आराई बहुत

शहाब अशरफ़

इश्क़ में तेरे कोह-ए-ग़म सर पे लिया जो हो सो हो

शाह नियाज़ अहमद नियाज़

ख़ाल-ए-मश्शाता बना काजल का चश्म-ए-यार पर

शाह नसीर

जिगर का जूँ शम्अ काश या-रब हो दाग़ रौशन मुराद हासिल

शाह नसीर

उम्र भर डोलती यादों की ज़िया से खेले

शफ़क़त बटालवी

रुकूँ तो रुकता है चलने पे साथ चलता है

शफ़ीक़ सलीमी

ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है शाह की मुख़्बर लगी हुई

शफ़ीक़ सलीमी

जैसे सुब्ह को सूरज निकले शाम ढले छुप जाए है

शफ़ीक़ देहलवी

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