आग Poetry (page 14)

कीजिए न असीरी में अगर ज़ब्त नफ़स को

मोहम्मद रफ़ी सौदा

आदम का जिस्म जब कि अनासिर से मिल बना

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बादल की तरह रंज-फ़िशानी करें हम भी

सऊद उस्मानी

ज़मीं की वुसअ'तों से आसमाँ तक

सत्यपाल जाँबाज़

कैसे बुझाएँ कौन बुझाए बुझे भी क्यूँ

सरवत ज़ेहरा

सवाब की दुआओं ने गुनाह कर दिया मुझे

सरवत ज़ेहरा

फिर आस दे के आज को कल कर दिया गया

सरवत ज़ेहरा

ज़ौक़-ए-सुख़न को अब तो तेरे आग लगाना अच्छा है

सरवर नेपाली

आग़ाज़-ए-मोहब्बत से अंजाम-ए-मोहब्बत तक

सरवर आलम राज़

बे-कैफ़ जवानी है बे-दर्द ज़माना है

सरवर आलम राज़

नई नई सी आग है या फिर कौन है वो

सरवत हुसैन

मैं आग देखता था आग से जुदा कर के

सरवत हुसैन

सुब्ह होते ही

सरवत हुसैन

मैं तुम्हें याद कर रहा था

सरवत हुसैन

ये होंट तिरे रेशम ऐसे

सरवत हुसैन

उसी किनारा-ए-हैरत-सरा को जाता हूँ

सरवत हुसैन

क़सम इस आग और पानी की

सरवत हुसैन

पूरे चाँद की सज धज है शहज़ादों वाली

सरवत हुसैन

जंगल में कभी जो घर बनाऊँ

सरवत हुसैन

फ़ुरात-ए-फ़ासिला से दजला-ए-दुआ से उधर

सरवत हुसैन

देखा जो उस तरफ़ तो बदन पर नज़र गई

सरवत हुसैन

आँखों में सौग़ात समेटे अपने घर आते हैं

सरवत हुसैन

मिल-जुल कर ईमान ख़ुदा पर ला सकते हैं

सरफ़राज़ ज़ाहिद

भँवर में मशवरे पानी से लेता हूँ

सरफ़राज़ ज़ाहिद

शहर भर के आईनों पर ख़ाक डाली जाएगी

सरफ़राज़ दानिश

लबों में आ के क़ुल्फ़ी हो गए अशआर सर्दी में

सरफ़राज़ शाहिद

अफ़्सोस क्या जो हम भी तुम्हारे नहीं रहे

सरदार सोज़

मैं वो आतिश-ए-नफ़स हूँ आग अभी

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

क़र्ज़

सारा शगुफ़्ता

परिंदा कमरे में रह गया

सारा शगुफ़्ता

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