आग Poetry (page 16)

रास्ता चाहिए दरिया की फ़रावानी को

सलीम शाहिद

मिरी थकन मिरे क़स्द-ए-सफ़र से ज़ाहिर है

सलीम शाहिद

इन दर-ओ-दीवार की आँखों से पट्टी खोल कर

सलीम शाहिद

आईनों से धूल मिटाने आते हैं

सलीम मुहीउद्दीन

ये आग लगने से पहले की बाज़-गश्त है जो

सलीम कौसर

कभी इश्क़ करो और फिर देखो इस आग में जलते रहने से

सलीम कौसर

वो जो हम-रही का ग़ुरूर था वो सवाद-ए-राह में जल-बुझा

सलीम कौसर

कभी सितारे कभी कहकशाँ बुलाता है

सलीम कौसर

इस आलम-ए-हैरत-ओ-इबरत में कुछ भी तो सराब नहीं होता

सलीम कौसर

डूबने वाले भी तन्हा थे तन्हा देखने वाले थे

सलीम कौसर

खो दिए हैं चाँद कितने इक सितारा माँग कर

सलीम फ़िगार

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में शाख़ से पत्ता निकाल दे

सलीम फ़िगार

नाईट-कलब

सलीम बेताब

जिस आग से दिल सुलग रहे थे

सलीम अहमद

इक आग सी जलती रही ता-उम्र लहू में

सलीम अहमद

बदन की आग को कहते हैं लोग झूटी आग

सलीम अहमद

मशरिक़ हार गया

सलीम अहमद

समाअतों को अमीन-ए-नवा-ए-राज़ किया

सलीम अहमद

मंज़िल-ए-बे-जहत की ख़ैर सई-ए-सफ़र है राएगाँ

सलीम अहमद

जो दिल में हैं दाग़ जल रहे हैं

सलीम अहमद

बन के दुनिया का तमाशा मो'तबर हो जाएँगे

सलीम अहमद

आँखों में सितारे से चमकते रहे ता-देर

सलीम अहमद

कश्मकश

सलाम मछली शहरी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

आग

सलाम मछली शहरी

फूलों के देस चाँद सितारों के शहर में

सलाम मछली शहरी

पहली नज़्म

सलाहुद्दीन परवेज़

चैत

सलाहुद्दीन परवेज़

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