आग Poetry (page 15)

बदन से पूरी आँख है मेरी

सारा शगुफ़्ता

आँखें दो जुडवाँ बहनें

सारा शगुफ़्ता

बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे

साक़िब लखनवी

हिज्र की शब नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे

साक़िब लखनवी

असीर-ए-इश्क़-ए-मरज़ हैं तो क्या दवा करते

साक़िब लखनवी

मुहासबा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं और मैं!

साक़ी फ़ारुक़ी

कैमरा

साक़ी फ़ारुक़ी

यूँ मिरे पास से हो कर न गुज़र जाना था

साक़ी फ़ारुक़ी

वो सख़ी है तो किसी रोज़ बुला कर ले जाए

साक़ी फ़ारुक़ी

वो आग हूँ कि नहीं चैन एक आन मुझे

साक़ी फ़ारुक़ी

वक़्त अभी पैदा न हुआ था तुम भी राज़ में थे

साक़ी फ़ारुक़ी

वही आँखों में और आँखों से पोशीदा भी रहता है

साक़ी फ़ारुक़ी

शहर का शहर हुआ जान का प्यासा कैसा

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

साक़ी फ़ारुक़ी

मिट्टी थी ख़फ़ा मौज उठा ले गई हम को

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं फिर से हो जाऊँगा तन्हा इक दिन

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़ामुशी छेड़ रही है कोई नौहा अपना

साक़ी फ़ारुक़ी

इक रात हम ऐसे मिलें जब ध्यान में साए न हों

साक़ी फ़ारुक़ी

दामन में आँसुओं का ज़ख़ीरा न कर अभी

साक़ी फ़ारुक़ी

ये कैसी आग है मुझ में कि एक मुद्दत से

सालिम सलीम

तुम्हारी आग में ख़ुद को जलाया था जो इक शब

सालिम सलीम

मेरी मिट्टी में कोई आग सी लग जाती है

सालिम सलीम

इक बर्फ़ सी जमी रहे दीवार-ओ-बाम पर

सालिम सलीम

कनार-ए-आब तिरे पैरहन बदलने का

सालिम सलीम

काम हर रोज़ ये होता है किस आसानी से

सालिम सलीम

बदन सिमटा हुआ और दश्त-ए-जाँ फैला हुआ है

सालिम सलीम

अब ऐसी बातें कोई करे जो सब के मन को लुभा जाएँ

सालिक लखनवी

यक़ीन है कि वो मेरी ज़बाँ समझता है

सलीम शहज़ाद

किसी रुत में जब मुस्कुराता है तू

सलीम शहज़ाद

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