आग Poetry (page 10)

पस्पाई

शरीफ़ कुंजाही

वो डर के आगे निकल जाएगा अगर यूँही

शारिब मौरान्वी

माह-ए-मुनीर

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

दिन-भर की दौड़ रात के औहाम वसवसे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

नया लहजा ग़ज़ल का मिस्रा-ए-सानी में रक्खा है

शमीम क़ासमी

पी ले जो लहू दिल का वो इश्क़ की मस्ती है

शमीम करहानी

पी कर भी तबीअत में तल्ख़ी है गिरानी है

शमीम करहानी

चमन लहक के रह गया घटा मचल के रह गई

शमीम करहानी

हर शय तुझी को सामने लाए तो क्या करूँ

शमीम जयपुरी

शाम ने बर्फ़ पहन रक्खी थी रौशनियाँ भी ठंडी थीं

शमीम हनफ़ी

सूरज धीरे धीरे पिघला फिर तारों में ढलने लगा

शमीम हनफ़ी

नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में

शमीम हनफ़ी

क्यूँ परेशान हुआ जाता है दिल क्या जाने

शमीम हनफ़ी

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

जो भी कहना हो वहाँ मेरी ज़बानी कहना

शमीम फ़ारूक़ी

शहर-ए-जाँ में इज़तिराब-ए-सोज़-ए-फ़न देखेगा कौन

शमीम आज़र

रुकने का अब नाम न ले है राही चलता जाए है

शमीम अनवर

गर्द-ए-मजनूँ ले के शायद बाद-ए-सहरा जाए है

शकील जाज़िब

मैं ने हाथों से बुझाई है दहकती हुई आग

शकील जमाली

पेट की आग बुझाने का सबब कर रहे हैं

शकील जमाली

अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए

शकील जमाली

जाम गर्दिश में है दर-बंद हैं मय-ख़ानों के

शकील बदायुनी

जादा-ए-इश्क़ में गिर गिर के सँभलते रहना

शकील बदायुनी

दिल में किसी ख़लिश का गुज़र चाहता हूँ मैं

शकील बदायुनी

तुम्हारे दर्द से ले कर हमारे आँसू तक

शकील आज़मी

धूप से बर-सर-ए-पैकार किया है मैं ने

शकील आज़मी

चाँद में ढलने सितारों में निकलने के लिए

शकील आज़मी

रौशन हैं दिल के दाग़ न आँखों के शब-चराग़

शकेब जलाली

हवा-ए-शब से न बुझते हैं और न जलते हैं

शकेब जलाली

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं

शकेब जलाली

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