विद्वान Poetry (page 18)

कैफ़-ए-मस्ती में अजब जलवा-ए-यकताई था

साहिर देहल्वी

जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब

साहिर देहल्वी

जसद ने जान से पूछा कि क़ल्ब-ए-बे-रिया क्या है

साहिर देहल्वी

फ़ज़ा-ए-आलम-ए-क़ुदसी में है नश्व-ओ-नुमा मेरी

साहिर देहल्वी

दिल है बहर-ए-बे-कराँ दिल की उमंग

साहिर देहल्वी

इक बर्फ़ का दरिया अंदर था

साहिबा शहरयार

सुख़न को तूल न दे अपनी एहतियाज बता

सहबा वहीद

यूँ भी हुआ इक अर्से तक इक शे'र न मुझ से तमाम हुआ

सहबा अख़्तर

कुल जहाँ इक आईना है हुस्न की तहरीर का

सहबा अख़्तर

हिसाब-ए-शब

सहर अंसारी

क्यूँ हर उरूज को यहाँ आख़िर ज़वाल है

सग़ीर मलाल

आओ इक सज्दा करें आलम-ए-मदहोशी में

साग़र सिद्दीक़ी

नज़र नज़र बे-क़रार सी है नफ़स नफ़स में शरार सा है

साग़र सिद्दीक़ी

मआल-ए-नग़्मा-ओ-मातम फ़रोख़्त होता है

साग़र सिद्दीक़ी

है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं

साग़र सिद्दीक़ी

एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं

साग़र सिद्दीक़ी

आओ इक सज्दा करूँ आलम-ए-बद-सम्ती में

साग़र निज़ामी

गेसू को तिरे रुख़ से बहम होने न देंगे

साग़र निज़ामी

दश्त में क़ैस नहीं कोह पे फ़रहाद नहीं

साग़र निज़ामी

रात के अँधेरों को रौशनी वो क्या देगा

साग़र आज़मी

वो आलम है कि मुँह फेरे हुए आलम निकलता है

सफ़ी लखनवी

वो आलम है कि मुँह फेरे हुए आलम निकलता है

सफ़ी लखनवी

दिए कितने अँधेरी उम्र के रस्तों में आते हैं

सफ़दर सिद्दीक़ रज़ी

एक इक लम्हा मुझे ज़ीस्त से बे-ज़ारी है

सादिक़ इंदौरी

उन्हें कह दो

सादिक़

बचपन की आँखें

सादिक़

मिसाल-ए-संग पड़ा कब तक इंतिज़ार करूँ

साबिर ज़फ़र

राह में शहर-ए-तरब याद आया

साबिर वसीम

जो ख़्वाब मेरे नहीं थे मैं उन को देखता था

साबिर वसीम

आज की रात

साबिर दत्त

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