विद्वान Poetry (page 20)

चराग़-ए-ज़ीस्त मद्धम है अभी तू नम न कर आँखें

रेनू नय्यर

जागती आँखों का ख़्वाब

रहमान फ़ारिस

शब-ए-दराज़ तुझे कुछ ख़बर गई कि नहीं

रज़ी रज़ीउद्दीन

था मिरी जस्त पे दरिया बड़ी हैरानी में

राज़ी अख्तर शौक़

रंग अब यूँ तिरी तस्वीर में भरता जाऊँ

राज़ी अख्तर शौक़

फिर राह दिखा मुझ को ऐ मशरब-ए-रिंदाना

रज़ा जौनपुरी

दिल को मामूर करो जज़्ब-ओ-असर से पहले

रज़ा जौनपुरी

ख़राब-ए-इश्क़ सही आलम-ए-शुहूद में हूँ

रज़ा हमदानी

शर्मिंदा नहीं कौन तिरी इश्वा-गरी का

रज़ा अज़ीमाबादी

क्या न-दीदों से ज़माने को सरोकार है आज

रज़ा अज़ीमाबादी

हर नफ़स मूरिद-ए-सफ़र हैं हम

रज़ा अज़ीमाबादी

बुतों को फ़ाएदा क्या है जो हम से जंग करते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

हूँ शामिल सब में और सब से जुदा हूँ

रज़ा अमरोही

दिल में झाँका तो बहुत ज़ख़्म पुराने निकले

रज़ा अमरोही

तुझ पे खुल जाए कि क्या मेहर को शबनम से मिला

रविश सिद्दीक़ी

सुकूँ है हमनवा-ए-इज़्तिराब आहिस्ता आहिस्ता

रविश सिद्दीक़ी

शिकस्त-ए-रंग-ए-तमन्ना को अर्ज़-ए-हाल कहूँ

रविश सिद्दीक़ी

पशेमाँ हैं तर्क-ए-मोहब्बत के बा'द

रविश सिद्दीक़ी

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ को हम-रिश्ता-ए-जाँ कहता हूँ

रविश सिद्दीक़ी

क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम

रविश सिद्दीक़ी

इश्क़ दुश्वार नहीं ख़ुश-नज़री मुश्किल है

रविश सिद्दीक़ी

रब्त हो ग़ैर से अगर कुछ है

रौनक़ टोंकवी

न बातें कीं न तस्कीं दी न पहलू में ज़रा ठहरे

रौनक़ टोंकवी

आलम में न कुछ कसरत-ए-अनवार को देखें

रौनक़ टोंकवी

अँधेरी खाई से गोया सफ़र चटान का था

रौनक़ रज़ा

ग़म की बस्ती अजीब बस्ती है

रतन पंडोरवी

लाव-लश्कर जाह-ओ-हशमत है यहाँ

रसूल साक़ी

तुम्हें ऐसा बे-रहम जाना न था

रासिख़ अज़ीमाबादी

कोई हैरान है याँ कोई दिल-गीर

रासिख़ अज़ीमाबादी

मौसम के मुताबिक़ कोई सामाँ भी नहीं है

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

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