विद्वान Poetry (page 19)

मौसमों का जवाब दे दीजे

साबिर दत्त

तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है

साबिर

वो आलम तिश्नगी का है सफ़र आसाँ नहीं लगता

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

इस रंग में अपने दिल-ए-नादाँ से गिला है

सबा अकबराबादी

है जो दरवेश वो सुल्ताँ है ये मा'लूम हुआ

सबा अकबराबादी

होश-ओ-ख़िरद से दूर हूँ सूद-ओ-ज़ियाँ से दूर

सबा अफ़ग़ानी

बसा-औक़ात आ जाते हैं दामन से गरेबाँ में

साइल देहलवी

ये एहतियात इश्क़ पे लाज़िम सदा रहे

रोहित सोनी ‘ताबिश’

हवा-ए-जिंदगी भी कूचा-ए-क़ातिल से आती है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

ज़बान पे नाला-ओ-फ़रियाद के सिवा क्या है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

वो अपनी आन में गुम है मैं अपनी आन में गुम

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

साबुन

रियाज़ लतीफ़

छुपता नहीं छपाने से आलम उभार का

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की

रियाज़ ख़ैराबादी

वो कौन है दुनिया में जिसे ग़म नहीं होता

रियाज़ ख़ैराबादी

उस हुस्न का शैदा हूँ उस हुस्न का दीवाना

रियाज़ ख़ैराबादी

सितम-ए-ना-रवा को रोते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

जो हम आए तो बोतल क्यूँ अलग पीर-ए-मुग़ाँ रख दी

रियाज़ ख़ैराबादी

दर खुला सुब्ह को पौ फटते ही मय-ख़ाने का

रियाज़ ख़ैराबादी

ये आलम-ए-वहशत है कि दहशत का असर है

रियासत अली ताज

वही तवील सी राहें सफ़र वही तन्हा

ऋषि पटियालवी

मय पिला ऐसी कि साक़ी न रहे होश मुझे

रिन्द लखनवी

बरहना देख कर आशिक़ में जान-ए-ताज़ा आती है

रिन्द लखनवी

तोहमत-ए-हसरत-ए-पर्वाज़ न मुझ पर बाँधे

रिन्द लखनवी

सातों फ़लक किए तह-ओ-बाला निकल गया

रिन्द लखनवी

नहीं क़ौल से फ़ेल तेरे मुताबिक़

रिन्द लखनवी

क्यूँ अंधेरों का मुसाफ़िर है मुक़द्दर अपना

रिफ़अतुल क़ासमी

इब्तिदा हूँ कि इंतिहा हूँ मैं

रिफ़अत सुलतान

शहर-ए-शोर-ओ-शर तन्हा घर के बाम-ओ-दर तन्हा

रिफ़अत सरोश

पहली बरसात की घटा छाई

रिफ़अत अल हुसैनी

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