विद्वान Poetry (page 7)

मंज़िलों से बेगाना आज भी सफ़र मेरा

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

कर क़त्ल मुझे उन ने आलम में बहुत ढूँडा

ताबाँ अब्दुल हई

अगर तू शोहरा-ए-आफ़ाक़ है तो तेरे बंदों में

ताबाँ अब्दुल हई

तुम्हारे हिज्र में रहता है हम को ग़म मियाँ-साहिब

ताबाँ अब्दुल हई

तिरे मिज़्गाँ की फ़ौजें बाँध कर सफ़ जब हुईं ख़ड़ियाँ

ताबाँ अब्दुल हई

मुझे ऐश ओ इशरत की क़ुदरत नहीं है

ताबाँ अब्दुल हई

मैं हो के तिरे ग़म से नाशाद बहुत रोया

ताबाँ अब्दुल हई

क्या करें क्यूँ-कर रहें दुनिया में यारो हम ख़ुशी

ताबाँ अब्दुल हई

उठते जाते हैं बज़्म-ए-आलम से

तअशशुक़ लखनवी

बाग़ में फूलों को रौंद आई सवारी आप की

तअशशुक़ लखनवी

यूँ तो इख़्लास में इस के कोई धोका भी नहीं

सय्यदा शान-ए-मेराज

कभी कभी तिरी चाहत पे ये गुमाँ गुज़रा

सय्यदा शान-ए-मेराज

कोई बतलाए माजरा क्या है

सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ

मेरी बीवी क़ब्र में लेटी है जिस हंगाम से

सय्यद ज़मीर जाफ़री

वही गुल है गुलिस्ताँ में वही है शम्अ' महफ़िल में

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

रोने की ये शिद्दत है कि घबरा गईं आँखें

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

ले के अपनी ज़ुल्फ़ को वो प्यारे प्यारे हाथ में

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

जाँ-फ़िशानी का वाँ हिसाब अबस

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

इंक़लाब

सय्यद तसलीम हैदर क़मर

सब्र-ओ-तस्लीम की सिपर भी नहीं

सय्यद सिद्दीक़ हसन

तू नहीं है तो ज़िंदगी है उदास

सय्यद प्रवेज़

याद के त्यौहार में वस्ल-ओ-वफ़ा सब चाहिए

सय्यद मुनीर

बढ़ा तन्हाई में एहसास-ए-ग़म आहिस्ता आहिस्ता

सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी

मिला जो ख़ार तो दिल में बिठा लिया मैं ने

सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली

इम्तिहान

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

ख़ाक-दाँ को हासिल-ए-ज़ौक़-ए-नज़र समझा था मैं

सय्यद मेराज जामी

तौर अपना है अलग ईं से अलग आँ से अलग

सय्यद जमील मदनी

कुछ तिरे नाज़-ओ-सितम और उठाना चाहे

सय्यद इक़बाल रिज़वी शारिब

शिकवा गर कीजे तो होता है गुमाँ तक़्सीर का

सय्यद हामिद

तमाशा-गाह-ए-आलम पर्दा-दार रू-ए-ज़ेबा है

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

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