विद्वान Poetry (page 8)

मुझ को दौलत मिली तिरे ग़म की

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

दिल दुखा था मिरा ऐसा कि दिखाया न गया

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

आप बुलाएँ हम न आएँ ऐसी कोई बात नहीं

सय्यद आरिफ़ अली

ये आँख तंज़ न हो ज़ख़्म-ए-दिल हरा न लगे

सय्यद अमीन अशरफ़

वो ख़ुद को मेरे अंदर ढूँडता है

सय्यद अमीन अशरफ़

न जाने रौज़न-ए-दीवार क्या जादू जगाता है

सय्यद अमीन अशरफ़

ख़याल है कि हक़ीक़त है या फ़साना है

सय्यद अमीन अशरफ़

दिल शहर-ए-तहय्युर है कि वो मम्लिकत-आरा

सय्यद अमीन अशरफ़

सीने में आग आँख सू-ए-दर लगी रहे

सय्यद अाग़ा अली महर

होश का अंदाज़ा बे-होशी में है

सय्यद अाग़ा अली महर

जल्वा-ए-यार से क्या शिकवा-ए-बेजा कीजे

सय्यद आबिद अली आबिद

ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-जानाँ का निशाँ है कि जो था

सय्यद आबिद अली आबिद

यही नहीं कि मिरा दिल ही मेरे बस में न था

सुरूर बाराबंकवी

कहे तो कौन कहे सरगुज़श्त-ए-आख़िर-ए-शब

सुरूर बाराबंकवी

फ़स्ल-ए-गुल क्या कर गई आशुफ़्ता सामानों के साथ

सुरूर बाराबंकवी

चमन वालों को रक़्साँ-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ ले के उट्ठी है

सुरूर बाराबंकवी

और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात

सुरूर बाराबंकवी

आँख लग जाती है फिर भी जागता रहता हूँ मैं

सूरज नारायण

दौर-ए-बरहम बे-मअ'नी

सुनील कुमार जश्न

उस की जानिब देखते थे और सब ख़ामोश थे

सुलतान रशक

साअत-ए-मर्ग-ए-मुसलसल हर नफ़स भारी हुई

सुल्तान अख़्तर

रक़्स करता है ब-अंदाज़-ए-जुनूँ दौड़ता है

सुल्तान अख़्तर

कोई दुश्मन कोई हमदम भी नहीं साथ अपने

सुलैमान अरीब

हिसाब-ए-उम्र करो या हिसाब-ए-जाम करो

सुलैमान अरीब

नहीं इस दश्त में कोई ख़िज़र है

सुलैमान अहमद मानी

जब कोई आलम-ए-शुहूद न था

सुहैल अख़्तर

इन दिनों तेज़ बहुत तेज़ है धारा मेरा

सुहैल अख़्तर

सफ़र करो तो इक आलम दिखाई देता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

नवाह-ए-जाँ में कहीं अबतरी सी लगती है

सुहैल अहमद ज़ैदी

शौक़-ए-बुतान-ए-अंजुमन-आरा लिए हुए

सुहा मुजद्ददी

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