आंखें Poetry (page 40)

गर दिल में कर के सैर-ए-दिल-ए-दाग़-दार देख

अरशद अली ख़ान क़लक़

फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं

अर्श सिद्दीक़ी

दरवाज़ा तिरे शहर का वा चाहिए मुझ को

अर्श सिद्दीक़ी

मैं हूँ ऐसे बिखरा सा

अर्श सहबाई

ब-ज़ाहिर ये वही मिलने बिछड़ने की हिकायत है

अरमान नज्मी

हम हैं और ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ है आज-कल

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

तुम्हें खोजती हैं जो आँखें

आरिफ़ा शहज़ाद

देख लो गे ख़ुद!

आरिफ़ा शहज़ाद

जब भी दुश्मन बन के इस ने वार किया

आरिफ़ शफ़ीक़

मेरी सोच लरज़ उट्ठी है देख के प्यार का ये आलम

आरिफ़ अब्दुल मतीन

लिबास गर्द का और जिस्म नूर का निकला

अक़ील शादाब

हम ने हर सम्त बिछा रक्खी हैं आँखें अपनी

अनवर सदीद

आशियानों में न जब लौटे परिंदे तो 'सदीद'

अनवर सदीद

कासा-लेसों ने जो थी नज़्र उतारी तेरी

अनवर सदीद

अपने दिल की आदत है शहज़ादों वाली

अनवर सदीद

आरज़ू थी ये बिखेरें अपनी किरनें सुब्ह तक

अनवर सदीद

इश्क़ में ग़म के सिवा कोई ख़ुशी देखी नहीं

अनवर साबरी

कब ज़िया-बार तिरा चेहरा-ए-ज़ेबा होगा

अनवर मसूद

बस यूँही इक वहम सा है वाक़िआ ऐसा नहीं

अनवर मसूद

बस अब तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहुत पहलू निकलते हैं

अनवर मसूद

अब कहाँ और किसी चीज़ की जा रक्खी है

अनवर मसूद

बे-घर था फिर छोड़ गया घर जाने क्यूँ

अनवर जमाल अनवर

उस की सूरत उस की आँखें उस का चेहरा भूल गए

अनवार हबीब

बातें पागल हो जाती हैं

अनवार फ़ितरत

उन से हम लौ लगाए बैठे हैं

अनवर देहलवी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

आओ देखें अहल-ए-वफ़ा की होती है तौक़ीर कहाँ

अनवर मोअज़्ज़म

मेरे चेहरे पे हैं आँखें मिरे सीने में है दिल

अंजुम सलीमी

काश

अंजुम सलीमी

हम बे-वतन ख़्वाबों के जोलाहे हैं

अंजुम सलीमी

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