आंखें Poetry (page 2)

असरार बड़ी देर में ये मुझ पे खुला है

ज़ुल्फ़िक़ार अहसन

नदी किनारे बैठे रहना अच्छा है

ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश

हमारे शहर में आने की सूरत चाहती हैं

ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश

वो बूढ़ा इक ख़्वाब है और इक ख़्वाब में आता रहता है

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

सहराओं के दोस्त थे हम ख़ुद-आराई से ख़त्म हुए

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

सियाह पट्टी

ज़ुबैर रिज़वी

अंजाम क़िस्सा-गो का

ज़ुबैर रिज़वी

हम दोनों में कोई न अपने क़ौल-ओ-क़सम का सच्चा था

ज़ुबैर रिज़वी

आईने के आख़िरी इज़हार में

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

जुनून-ए-इश्क़-ए-सर बेदार भी है

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

ये तो हाथों की लकीरों में था गिर्दाब कोई

ज़िया ज़मीर

इतनी शिद्दत से गले मुझ को लगाया हुआ है

ज़िया ज़मीर

अब ये आँखें किसी तस्कीन से ताबिंदा नहीं

ज़िया जालंधरी

तुलूअ'

ज़िया जालंधरी

हरजाई

ज़िया जालंधरी

दूरी

ज़िया जालंधरी

चाक

ज़िया जालंधरी

बड़ा शहर

ज़िया जालंधरी

शजर जलते हैं शाख़ें जल रही हैं

ज़िया जालंधरी

रंग बातें करें और बातों से ख़ुश्बू आए

ज़िया जालंधरी

ख़ुद को समझा है फ़क़त वहम-ओ-गुमाँ भी हम ने

ज़िया जालंधरी

गुमाँ था या तिरी ख़ुश्बू यक़ीन अब भी नहीं

ज़िया जालंधरी

फ़ज़ाएँ इस क़दर बे-कल रही हैं

ज़िया जालंधरी

अब ये आँखें किसी तस्कीन से ताबिंदा नहीं

ज़िया जालंधरी

लब पर दिल की बात न आई

ज़िया फ़तेहाबादी

अपने होने का हर इक लम्हा पता देती हुई

ज़िया फ़ारूक़ी

ये ख़ाल-ओ-ख़द मिरे अपने

ज़ेहरा निगाह

कहानी गुल-ज़मीना की

ज़ेहरा निगाह

एक तिलिस्मी खेल

ज़ेहरा निगाह

डाकू

ज़ेहरा निगाह

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