आंसू Poetry (page 8)

आह ये आँसू प्यारे प्यारे

सिराज लखनवी

नहीं बुझती है प्यास आँसू सीं लेकिन

सिराज औरंगाबादी

कान में है तेरे मोती आब-दार

सिराज औरंगाबादी

सर्व-ए-गुलशन पर सुख़न उस क़द का बाला हो गया

सिराज औरंगाबादी

पुर-ख़ूँ है जिगर लाला-ए-सैराब की सौगंद

सिराज औरंगाबादी

मुझ पर ऐ महरम-ए-जाँ पर्दा-ए-असरार कूँ खोल

सिराज औरंगाबादी

क्यूँ तिरे गेसू कूँ गेसू बोलनाँ

सिराज औरंगाबादी

कहाँ है गुल-बदन मोहन पियारा

सिराज औरंगाबादी

इश्क़ में आ कि अक़्ल कूँ खोनाँ

सिराज औरंगाबादी

फ़िदा कर जान अगर जानी यही है

सिराज औरंगाबादी

अगर कुछ होश हम रखते तो मस्ताने हुए होते

सिराज औरंगाबादी

ग़म की भट्टी में ब-सद-शौक़ उतर जाऊँगा

श्याम सुन्दर नंदा नूर

मुँह से तिरे सौ बार के शरमाए हुए हैं

शोला अलीगढ़ी

जाने किस किस की तवज्जोह का तमाशा देखा

शोहरत बुख़ारी

इन को देखा था कहीं याद नहीं

शोहरत बुख़ारी

बज़्म संवारूँ ग़ज़लें गाऊँ

शोहरत बुख़ारी

पथराई आँखों में देखो क्या क्या रंग दिखाता आँसू

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

हिज्र में यूँ बहते हैं आँसू

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

मिरी आह बे-असर है मैं असर कहाँ से लाऊँ

शेवन बिजनौरी

हिजाब-ए-राज़ फ़ैज़-ए-मुर्शिद-ए-कामिल से उठता है

शेर सिंह नाज़ देहलवी

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में

ज़ौक़

मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला

ज़ौक़

किसी बेकस को ऐ बेदाद गर मारा तो क्या मारा

ज़ौक़

ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े

ज़ौक़

हुए क्यूँ उस पे आशिक़ हम अभी से

ज़ौक़

चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए

ज़ौक़

दिल में शोला था सो आँखों में नमी बनता गया

शहपर रसूल

सन कर बयान-ए-दर्द कलेजा दहल न जाए

शाज़ तमकनत

कोई तन्हाई का एहसास दिलाता है मुझे

शाज़ तमकनत

जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर

शाज़ तमकनत

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