आंख Poetry (page 30)

दोस्त क्या ख़ुद को भी पुर्सिश की इजाज़त नहीं दी

इफ़्तिख़ार आरिफ़

नाम को भी न किसी आँख से आँसू निकला

इब्राहीम अश्क

न दिल में कोई ग़म रहे न मेरी आँख नम रहे

इब्राहीम अश्क

मुझे न देखो मिरे जिस्म का धुआँ देखो

इब्राहीम अश्क

करता हूँ एक ख़्वाब के मुबहम नुक़ूश याद

इब्राहीम होश

आज की रात कटेगी क्यूँ कर साज़ न जाम न तो मेहमान

इब्न-ए-सफ़ी

कर बुरा तो भला नहीं होता

इब्न-ए-मुफ़्ती

हम से मिलते थे सितारे आप के

इब्न-ए-मुफ़्ती

बर्क़ ने जब भी आँख खोली है

इब्न-ए-मुफ़्ती

कुछ दे इसे रुख़्सत कर

इब्न-ए-इंशा

इस बस्ती के इक कूचे में

इब्न-ए-इंशा

अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले

इब्न-ए-इंशा

मैं उस की आँख में वो मेरे दिल की सैर में था

हुसैन ताज रिज़वी

है मेरे गिर्द यक़ीनन कहीं हिसार सा कुछ

हुसैन ताज रिज़वी

ढली जो शाम नज़र से उतर गया सूरज

हुसैन ताज रिज़वी

राहत ओ रंज से जुदा हो कर

हुसैन आबिद

उस के सिवा क्या अपनी दौलत

हुरमतुल इकराम

हवा की तेज़-गामियों का इंकिशाफ़ क्या करें

हुमैरा रहमान

वक़्त की आँख से कुछ ख़्वाब नए माँगता है

हुमैरा राहत

वक़्त ऐसा कोई तुझ पर आए

हुमैरा राहत

मिसाल-ए-ख़ाक कहीं पर बिखर के देखते हैं

हुमैरा राहत

किसी भी राएगानी से बड़ा है

हुमैरा राहत

कहानी को मुकम्मल जो करे वो बाब उठा लाई

हुमैरा राहत

फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है

हुमैरा राहत

हम भी हैं किसी कहफ़ के असहाब के मानिंद

हिमायत अली शाएर

हरीफ़-ए-विसाल

हिमायत अली शाएर

ये शहर-ए-रफ़ीक़ाँ है दिल-ए-ज़ार सँभल के

हिमायत अली शाएर

यम-ब-यम फैला हुआ है प्यास का सहरा यहाँ

हिमायत अली शाएर

मैं जो कुछ सोचता हूँ अब तुम्हें भी सोचना होगा

हिमायत अली शाएर

जो कुछ भी गुज़रता है मिरे दिल पे गुज़र जाए

हिमायत अली शाएर

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