आंख Poetry (page 36)

सूरज को क्या पता है किधर धूप चाहिए

ग़यास मतीन

जज़ीरे हों कि वो सहरा हों ख़्वाब होना है

ग़यास मतीन

धूप का एहसास जाने क्यूँ उसे होता नहीं

ग़यास मतीन

उस शो'ला-रू से जब से मिरी आँख जा लगी

ग़मगीन देहलवी

जबीन-ए-शौक़ पे गर्द-ए-मलाल चाहती है

ग़ालिब अयाज़

हुआ करेगा हर इक लफ़्ज़ मुश्क-बार अपना

ग़ालिब अयाज़

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल

ग़ालिब

इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं

ग़ालिब

क़फ़स में हूँ गर अच्छा भी न जानें मेरे शेवन को

ग़ालिब

मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है

ग़ालिब

मस्जिद के ज़ेर-ए-साया ख़राबात चाहिए

ग़ालिब

मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को नूर की

ग़ालिब

जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार

ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

ग़ालिब

ग़म खाने में बूदा दिल-ए-नाकाम बहुत है

ग़ालिब

बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे

ग़ालिब

उस माह-रू पे आँख किसी की न पड़ सकी

जोर्ज पेश शोर

पैक-ए-ख़याल भी है अजब क्या जहाँ-नुमा

जोर्ज पेश शोर

इंतिज़ार-ए-दीद में यूँ आँख पथराई कि बस

ग़व्वास क़ुरैशी

दुखी दिलों में, दुखी साथियों में रहते थे

गौहर होशियारपुरी

दिल तमाम आईने तीरा कौन रौशन कौन

गौहर होशियारपुरी

चेहरे मकान राह के पत्थर बदल गए

फ़ुज़ैल जाफ़री

ये सच नहीं कि तमाज़त से डर गई है नदी

फ़िरदौस गयावी

उसी की शरह है ये उठते दर्द का आलम

फ़िराक़ गोरखपुरी

फ़ज़ा तबस्सुम-ए-सुब्ह-ए-बहार थी लेकिन

फ़िराक़ गोरखपुरी

शाम-ए-अयादत

फ़िराक़ गोरखपुरी

परछाइयाँ

फ़िराक़ गोरखपुरी

जुगनू

फ़िराक़ गोरखपुरी

जुदाई

फ़िराक़ गोरखपुरी

हिण्डोला

फ़िराक़ गोरखपुरी

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