आंख Poetry (page 45)

है बहुत मुश्किल निकलना शहर के बाज़ार में

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

घटा सावन की उमडी आ रही है

बीएस जैन जौहर

सिमट गई तो शबनम फूल सितारा थी

अज़रा परवीन

अब आँख भी मश्शाक़ हुई ज़ेर-ओ-ज़बर की

अज़रा परवीन

ख़्वाब-जंगल

अज़रा नक़वी

मेल उतारना मुश्किल लगता है

अज़रा अब्बास

फ़ीमेल बुल-फ़ाइटर

अज़रा अब्बास

वुसअत-ए-चश्म को अंदोह-ए-बसारत लिक्खा

अज़्म बहज़ाद

उस आँख से वहशत की तासीर उठा लाया

अज़्म बहज़ाद

मैं ने कल ख़्वाब में आइंदा को चलते देखा

अज़्म बहज़ाद

समझ के रस्ता इधर से गुज़रने वालों ने

अज़लान शाह

बे-यक़ीनी का तअल्लुक़ भी यक़ीं से निकला

अज़लान शाह

कहानी

अज़ीज़ तमन्नाई

आईने से

अज़ीज़ क़ैसी

पस-ए-तर्क-ए-इश्क़ भी उम्र-भर तरफ़-ए-मिज़ा पे तरी रही

अज़ीज़ क़ैसी

हर आँख लहू सागर है मियाँ हर दिल पत्थर सन्नाटा है

अज़ीज़ क़ैसी

मैं किसी आँख से छलका हुआ आँसू हूँ 'नबील'

अज़ीज़ नबील

ज़मीं की आँख से मंज़र कोई उतारते हैं

अज़ीज़ नबील

वक़्त की आँख में सदियों की थकन है, मैं हूँ

अज़ीज़ नबील

मैं नींद के ऐवान में हैरान था कल शब

अज़ीज़ नबील

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी

अज़ीज़ नबील

गुज़रने वाली हवा को बता दिया गया है

अज़ीज़ नबील

ये ग़लत है ऐ दिल-ए-बद-गुमाँ कि वहाँ किसी का गुज़र नहीं

अज़ीज़ लखनवी

नारा-ए-तकबीर भी ज़ाहिद निसार-ए-नग़मा है

अज़ीज़ हैदराबादी

एक तरफ़ रू-ए-जानाँ था जलती आँख में एक तरफ़

अज़ीज़ हामिद मदनी

नावक-ए-ताज़ा दिल पर मारा जंग पुरानी जारी की

अज़ीज़ हामिद मदनी

नरमी हवा की मौज-ए-तरब-ख़ेज़ अभी से है

अज़ीज़ हामिद मदनी

न फ़ासले कोई निकले न क़ुर्बतें निकलीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

बैठो जी का बोझ उतारें दोनों वक़्त यहीं मिलते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

मिरे मिज़ाज को सूरज से जोड़ता क्यूँ है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

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