आंख Poetry (page 47)

ज़िंदगी आईना है आईना-आराई है

अता शाद

दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा

अता शाद

रूदाद-ए-ग़म-ए-उल्फ़त उन से हम क्या कहते क्यूँकर कहते

असरार-उल-हक़ मजाज़

फिर मिरी आँख हो गई नमनाक

असरार-उल-हक़ मजाज़

हम अर्ज़-ए-वफ़ा भी कर न सके कुछ कह न सके कुछ सुन न सके

असरार-उल-हक़ मजाज़

रात और रेल

असरार-उल-हक़ मजाज़

पहला जश्न-ए-आज़ादी

असरार-उल-हक़ मजाज़

नूरा

असरार-उल-हक़ मजाज़

नज़्र-ए-अलीगढ़

असरार-उल-हक़ मजाज़

इशरत-ए-तन्हाई

असरार-उल-हक़ मजाज़

ये तीरगी-ए-शब ही कुछ सुब्ह-तराज़ आती

असरार-उल-हक़ मजाज़

तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई वो सई-ए-करम फ़रमा भी गए

असरार-उल-हक़ मजाज़

परतव-ए-साग़र-ए-सहबा क्या था

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़ामुशी का तो नाम होता है

असरार-उल-हक़ मजाज़

जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है

असरार-उल-हक़ मजाज़

आसमाँ तक जो नाला पहुँचा है

असरार-उल-हक़ मजाज़

सुना है चाँदनी-रातों में अक्सर तुम

असरा रिज़वी

ख़्वाब इक जज़ीरा है

असरा रिज़वी

ज़िंदगी उलझी है बिखरे हुए गेसू की तरह

असरा रिज़वी

वो शख़्स फिर कहानी का उन्वान बन गया

असरा रिज़वी

आग जो दिल में लगी है वो बुझा दी जाए

असरा रिज़वी

तेरा सूरज आएगा

असलम राशिद

सोच की उलझी हुई झाड़ी की जानिब जो गई

असलम कोलसरी

न देख मुझ को मोहब्बत की आँख से ऐ दोस्त

असलम फ़र्रुख़ी

मैं सोचता हूँ कहीं तू ख़फ़ा न हो जाए

असलम फ़र्रुख़ी

वो शब-ए-ग़म जो कम अँधेरी थी

असलम इमादी

होंटों को फूल आँख को बादा नहीं कहा

आसिम वास्ती

तुम इंतिज़ार के लम्हे शुमार मत करना

आसिम वास्ती

मौजूद जो नहीं वही देखा बना हुआ

आसिम वास्ती

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