आंख Poetry (page 46)

सिलसिला यूँ भी रवा रक्खा शनासाई का

अज़हर नवाज़

हरे दरख़्त का शाख़ों से रिश्ता टूट गया

अज़हर नैयर

दरीचे सो गए शब जागती है

अज़हर नैयर

तिरे ब'अद कोई भी ग़म असर नहीं कर सका

अज़हर फ़राग़

शब भर आँख में भीगा था

अज़हर अदीब

कभी उस से दुआ की खेतियाँ सैराब करना

अज़हर अदीब

बे-ख़्वाबी कब छुप सकती है काजल से भी

अज़हर अदीब

क्या तेरा क्या मेरा ख़्वाब

अज़हर अदीब

दिल प्यासा और आँख सवाली रह जाती है

अज़हर अदीब

हवा-ए-तेज़ के आगे कहाँ रहेगा कोई

अज़हर अब्बास

ग़म का ये सलीक़ा भी रह गया है अब हम तक

अज़ीम मुर्तज़ा

हमारी आँख में ठहरा हुआ समुंदर था

आज़ाद गुलाटी

सफ़र में फ़ासलों के साथ बादबान खो दिया

अय्यूब ख़ावर

अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया

औरंगज़ेब

आ कर उरूज कैसे गिरा है ज़वाल पर

औरंगज़ेब

चार-सू आलम-ए-इम्काँ में अँधेरा देखा

औज लखनवी

निगाह कोई तो तूफ़ाँ में मेहरबान सी है

अतुल अजनबी

वो जो सर्फ़-ए-निगाह करता है

अतीक़ुल्लाह

कर के ख़्वाब आँख में पहले तो वो लाए ख़ुद को

आतिफ़ ख़ान

यही जो तेरे मिरे दिल की राजधानी थी

अतहर नासिक

अगर यक़ीन न रखते गुमान तो रखते

अतहर नासिक

तू मिला था और मेरे हाल पर रोया भी था

अतहर नफ़ीस

दिल तो बरसाता है हर रोज़ ही ग़म के सावन

अतहर अज़ीज़

फूल पर ओस है आरिज़ पे नमी हो जैसे

अतीक़ अंज़र

मिरी ज़िंदगी किसी मोड़ पर कभी आँसुओं से वफ़ा न दे

अतीक़ अंज़र

तिलिस्म-ए-शब से बहुत बे-ख़बर चले आए

अताउर्रहमान क़ाज़ी

आँसू तुम्हारी आँख में आए तो उठ गए

अताउर्रहमान जमील

एक फ़लर्ट लड़की

अताउल हक़ क़ासमी

वो दश्त-ए-कर्ब-ओ-बला में उतरने देता नहीं

अताउल हक़ क़ासमी

रात वहशत से गुरेज़ाँ था मैं आहू की तरह

अता तुराब

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