आंख Poetry (page 44)

सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे

बशीर बद्र

कोई लश्कर कि धड़कते हुए ग़म आते हैं

बशीर बद्र

ख़ून पत्तों पे जमा हो जैसे

बशीर बद्र

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

जब तक निगार-ए-दाश्त का सीना दुखा न था

बशीर बद्र

फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है

बशीर बद्र

चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली

बशीर बद्र

अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे

बशीर बद्र

जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया

बशीरुद्दीन राज़

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

बशर नवाज़

ज़ेर-ए-ज़मीं हूँ तिश्ना-ए-दीदार-ए-यार का

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वो शाह-ए-हुस्न जो बे-मिस्ल है हसीनों में

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

शम्अ भी इस सफ़ा से जलती है

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

बे-बुलाए हुए जाना मुझे मंज़ूर नहीं

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

मत तंग हो करे जो फ़लक तुझ को तंग-दस्त

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

जब मेरे दिल जिगर की तिलिस्में बनाइयाँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

ख़बर सुनेगा मिरी मौत की तो ख़ुश होगा

बाक़र मेहदी

अजीब दिल में मिरे आज इज़्तिराब सा है!

बाक़र मेहदी

दीवारें

बलराज कोमल

चाल अपनी अदा से चलते हैं

बकुल देव

उसी के ज़ुल्म से मैं हालत-ए-पनाह में था

बख़्श लाइलपूरी

लड़ा कर आँख उस से हम ने दुश्मन कर लिया अपना

ज़फ़र

हम ही उन को बाम पे लाए और हमीं महरूम रहे

ज़फ़र

ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई

ज़फ़र

क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर

ज़फ़र

यास की कोहर में लिपटा हुआ चेहरा देखा

बाग़ हुसैन कमाल

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