आंख Poetry (page 43)

माशूक़ हमें बात का पूरा नहीं मिलता

बेख़ुद देहलवी

लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें

बेख़ुद देहलवी

कब तक करेंगे जब्र दिल-ए-ना-सुबूर पर

बेख़ुद देहलवी

हज़रत-ए-दिल ये इश्क़ है दर्द से कसमसाए क्यूँ

बेख़ुद देहलवी

दिल है मुश्ताक़ जुदा आँख तलबगार जुदा

बेख़ुद देहलवी

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर

बेख़ुद देहलवी

बज़्म-ए-दुश्मन में बुलाते हो ये क्या करते हो

बेख़ुद देहलवी

बनी थी दिल पे कुछ ऐसी की इज़्तिराब न था

बेख़ुद देहलवी

यूँही रहा जो बुतों पर निसार दिल मेरा

बेखुद बदायुनी

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

रहने दे रतजगों में परेशाँ मज़ीद उसे

बेदिल हैदरी

वो ले गया है मिरी आँख अपनी बस्ती में

बेदार सरमदी

किरन में फिर से बदलने लगा ख़याल उस का

बेदार सरमदी

न मेहराब-ए-हरम समझे न जाने ताक़-ए-बुत-ख़ाना

बेदम शाह वारसी

बुत भी इस में रहते थे दिल यार का भी काशाना था

बेदम शाह वारसी

बड़ी दिल-शिकन है रह-ए-सफ़र कोई हम-सफ़र है न यार है

बेबाक भोजपुरी

वो हटे आँख के आगे से तो बस सूरत-ए-अक्स

बयान मेरठी

सर-ए-शोरीदा पा-ए-दश्त-ए-पैमा शाम-ए-हिज्राँ था

बयान मेरठी

ऐ जुनूँ हाथ के चलते ही मचल जाऊँगा

बयान मेरठी

पूछता कौन है डरता है तू ऐ यार अबस

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

कभी दर पर कभी है रस्ते में

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

लड़ ही जाए किसी निगार से आँख

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

मेरी आँख के तारे अब न देख पाओगे

बशीर बद्र

मैं जिस की आँख का आँसू था उस ने क़द्र न की

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर

बशीर बद्र

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं

बशीर बद्र

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं

बशीर बद्र

शाम आँखों में आँख पानी में

बशीर बद्र

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