आंख Poetry (page 41)

इक हरे ख़त में कोई बात पुरानी पढ़ना

दिनेश नायडू

ज़मीन अपने ही मेहवर से हट रही होगी

दिलावर अली आज़र

मुमकिन है कि मिलते कोई दम दोनों किनारे

दिलावर अली आज़र

आँख में ख़्वाब ज़माने से अलग रक्खा है

दिलावर अली आज़र

क्या कहिए दास्तान-ए-तमन्ना बदल गई

दिल शाहजहाँपुरी

महक कलियों की फूलों की हँसी अच्छी नहीं लगती

देवमणि पांडेय

मैं ने अपना हक़ माँगा था वो नाहक़ ही रूठ गया

दीप्ति मिश्रा

हुस्न-ए-अज़ल का जल्वा हमारी नज़र में है

दत्तात्रिया कैफ़ी

जज़्बा-ए-दिल को अमल में कभी लाओ तो सही

दर्शन सिंह

हँसी गुलों में सितारों में रौशनी न मिली

दर्शन सिंह

जान से हो गए बदन ख़ाली

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

तुझी को जो याँ जल्वा-फ़रमा न देखा

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

मिरा जी है जब तक तिरी जुस्तुजू है

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

जग में आ कर इधर उधर देखा

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

तमन्ना का दूसरा क़दम

दानियाल तरीर

संग-ए-बुनियाद

दानियाल तरीर

मैं नफ़ी में

दानियाल तरीर

उजाला ही उजाला रौशनी ही रौशनी है

दानियाल तरीर

साकित हो मगर सब को रवानी नज़र आए

दानियाल तरीर

रेत मुट्ठी में भरी पानी से आग़ाज़ किया

दानियाल तरीर

दुआ हमारी कभी बा-असर नहीं होती

दानिश फ़राही

चाह की चितवन में आँख उस की शरमाई हुई

दाग़ देहलवी

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं

दाग़ देहलवी

तुम आईना ही न हर बार देखते जाओ

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल ज़िद में बसर हो गई

दाग़ देहलवी

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह

दाग़ देहलवी

फिरे राह से वो यहाँ आते आते

दाग़ देहलवी

मिन्नतों से भी न वो हूर-शमाइल आया

दाग़ देहलवी

खुलता नहीं है राज़ हमारे बयान से

दाग़ देहलवी

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