आंख Poetry (page 39)

कहीं यक़ीं से न हो जाएँ हम गुमाँ की तरह

फ़रह इक़बाल

एक मुद्दत से यहाँ ठहरा हुआ पानी है

फ़रह इक़बाल

देखा पलट के जब भी तो फैला ग़ुबार था

फ़रह इक़बाल

कभी यक़ीं से हुई और कभी गुमाँ से हुई

फ़राग़ रोहवी

जिस्म में गूँजता है रूह पे लिक्खा दुख है

फ़क़ीह हैदर

दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ में किस का ज़ुहूर था

फ़ानी बदायुनी

आँख उठाई ही थी कि खाई चोट

फ़ानी बदायुनी

ताकीद है कि दीदा-ए-दिल वा करे कोई

फ़ानी बदायुनी

नहीं मंज़ूर तप-ए-हिज्र का रुस्वा होना

फ़ानी बदायुनी

मर कर मरीज़-ए-ग़म की वो हालत नहीं रही

फ़ानी बदायुनी

दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ में किस का ज़ुहूर था

फ़ानी बदायुनी

दुनिया मेरी बला जाने महँगी है या सस्ती है

फ़ानी बदायुनी

बिजलियाँ टूट पड़ीं जब वो मुक़ाबिल से उठा

फ़ानी बदायुनी

बे-ख़ुदी पे था 'फ़ानी' कुछ न इख़्तियार अपना

फ़ानी बदायुनी

आँख उठाई ही थी कि खाई चोट

फ़ानी बदायुनी

वो आँख क्या जो आरिज़ ओ रुख़ पर ठहर न जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी

या रब मिरी हयात से ग़म का असर न जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ग़म हर इक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं

फ़ना निज़ामी कानपुरी

मेरे रश्क-ए-क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया

फ़ना बुलंदशहरी

किस को सुनाऊँ हाल-ए-ग़म कोई ग़म-आश्ना नहीं

फ़ना बुलंदशहरी

जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया

फ़ना बुलंदशहरी

है वज्ह कोई ख़ास मिरी आँख जो नम है

फ़ना बुलंदशहरी

रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे

फ़ैज़ी

जो दिल को पहले मयस्सर था क्या हुआ उस का

फ़ैज़ी

ये किस दयार-ए-अदम में...

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शीशों का मसीहा कोई नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शाएर लोग

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ख़ुदा वो वक़्त न लाए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कहाँ जाओगे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हुस्न और मौत

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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