आंख Poetry (page 42)

दिल परेशान हुआ जाता है

दाग़ देहलवी

डरते हैं चश्म ओ ज़ुल्फ़ ओ निगाह ओ अदा से हम

दाग़ देहलवी

भला हो पीर-ए-मुग़ाँ का इधर निगाह मिले

दाग़ देहलवी

बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया

दाग़ देहलवी

बी.टी-नामा

कर्नल मोहम्मद ख़ान

कभी हवा ने कभी उड़ते पत्थरों ने किया

चंद्र प्रकाश शाद

बदन को अपनी बिसात तक तो पसारना था

चंद्र प्रकाश शाद

जले चराग़ बुझाने की ज़िद नहीं करते

चाँदनी पांडे

एक मुद्दत से उसे देखा नहीं

चाँदनी पांडे

क्या हुस्न है यूसुफ़ भी ख़रीदार है तेरा

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

ख़ामुशी में क़यास मेरा है

बबल्स होरा सबा

हैराँ हूँ कि अब लाऊँ कहाँ से मैं ज़बाँ और

बिस्मिल साबरी

देखा न तुम ने आँख उठा कर भी एक बार

बिस्मिल अज़ीमाबादी

तंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हम

बिस्मिल अज़ीमाबादी

न अपने ज़ब्त को रुस्वा करो सता के मुझे

बिस्मिल अज़ीमाबादी

कहाँ आया है दीवानों को तेरा कुछ क़रार अब तक

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अब रहा क्या है जो अब आए हैं आने वाले

बिस्मिल अज़ीमाबादी

देखने निकला हूँ दुनिया को मगर क्या देखूँ

बिमल कृष्ण अश्क

जो दिल में उस को बसाए वो और कुछ न करे

बिमल कृष्ण अश्क

चाँद को रेशमी बादल से उलझता देखूँ

बिमल कृष्ण अश्क

लगा के नक़्ब किसी रोज़ मार सकते हैं

बिल्क़ीस ख़ान

आ जाए न दिल आप का भी और किसी पर

भारतेंदु हरिश्चंद्र

गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बैठे जो शाम से तिरे दर पे सहर हुई

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे

भारत भूषण पन्त

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

तुम्हें हम चाहते तो हैं मगर क्या

बेख़ुद देहलवी

पछताओगे फिर हम से शरारत नहीं अच्छी

बेख़ुद देहलवी

मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद

बेख़ुद देहलवी

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